भारत में इस्लाम

भारतीय गणतंत्र में हिन्दू धर्म के बाद इस्लाम धर्म दूसरा सर्वाधिक प्रचलित धर्म है,[5] जो देश की जनसंख्या का १४.२% है (2011 की जनगणना के अनुसार १७.२ करोड़)।[6][7][8][9]

भारत में इस्लाम का आगमन करीब सातवीं शताब्दी में हुआ था (६२९ ईसवी सन्‌) और तब से यह भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक अभिन्न अंग बन गया है।[10][11] घोघा, गुजरात में बरवाड़ा मस्जिद, (623 ईसवी सन्‌ से पहले निर्मित), मेथला, केरल में चेरामन जुमा मस्जिद (629 ईसवी सन्‌) और तमिलनाडु के पलैया जुम्मा पल्ली (या पुरानी जुम्मा मस्जिद – 628- 630 ईसवी सन्‌), किलाकरई में पहली मस्जिदों में से तीन हैं। भारत में, जो अरब व्यापारियों को समुद्र के द्वारा बनाया गया था।[12] मोहम्मद ग़ोरी विजय के माध्यम से बारवीं शताब्दी में इस्लाम उत्तर भारत में आया और तब से भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा बन गया। वर्षों से, सम्पूर्ण भारत में हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियों का एक अद्भुत मिलन होता आया है[13][14] और भारत के आर्थिक उदय और सांस्कृतिक प्रभुत्व में मुसलमानों ने महती भूमिका निभाई है।

भारत में विवाह, विरासत और वक्फ संपत्ति से जुड़े मुसलमानों के अधिकार मामले मुस्लिम व्यक्तिगत कानून द्वारा नियंत्रित होते हैं[15] और अदालतों ने यह फैसला दिया कि शरीयत या मुस्लिम कानून की भारतीय नागरिक कानून की अपेक्षा अधिक प्रधानता होगी।[16]

भारत की मुस्लिम आबादी विश्व की तीसरी सर्वाधिक है[17][18] और दुनिया भर में सबसे अधिक मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी है।[19] भारत में अधिकांश मुसलमान भारतीय जातीय समूह से संबंधित हैं, जिसमें भारत से बाहर के भी कुछ मुस्लिम शामिल हैं, मुख्य रूप से फारस और मध्य एशिया के।[20][21]

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुसलमानों की कुल जनसंख्या का सर्वाधिक संकेन्द्रण 47% है – जो तीन राज्य में निवास करते हैं उत्तर प्रदेश (4.07 करोड़) (19.3%), पश्चिम बंगाल (3.02 करोड़) (27%) और बिहार (1.37 करोड़) (16.9%)।[22] मुस्लिम, लक्षद्वीप (2001 में 93%) और जम्मू और कश्मीर (2011 में 68%) में स्थानीय जनसंख्या के बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुसलमानों की उच्च संख्या असम (35%), पश्चिम बंगाल (28%) दक्षिणी राज्य केरल में (27.7%) पाई जाती है। आधिकारिक तौर पर, भारत में मुसलमानों की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है (इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद)।[23][24]

पाकिस्तान में भारत की तुलना में अधिक मुसलमान हैं, जैसा कि पाकिस्तान में 2017 की जनगणना के अस्थायी परिणाम, जो 25 अगस्त, 2017 को जारी किए गए थे,[25] आबादी 20.7 करोड़ हैं।[26][27] पाकिस्तान की जनगणना के अनंतिम परिणामों में गिलगित-बाल्तिस्तान और आज़ाद कश्मीर के आंकड़ों को शामिल नहीं किया गया है, जो कि अंतिम रिपोर्ट में शामिल होने की संभावना है जो 2018 में आ जाएगा।[28][29]

2017 के अनुसार मुस्लिम आबादी (शीर्ष 5 देशों)

भारत में देश के अन्य धार्मिक समुदायों की तुलना में मुसलमानों में एक बहुत उच्च कुल प्रजनन दर (टीएफआर) है।[30] उच्च जन्म दर और पड़ोसी देश बांग्लादेश से प्रवासियों के आगम की वजह से भारत में मुसलमानों का प्रतिशत 1991 में 10% से बढ़ कर 2001 में 17 प्रतिशत हो गया है।[31] कुल वृद्धि दर में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर हिंदुओं की वृद्धि दर की तुलना में 30 प्रतिशत से भी अधिक है।[32] हालांकि, 1991 से भारत में सभी धार्मिक समूहों की प्रजनन दर में सबसे बड़ी गिरावट मुसलमानों के बीच हुई है।[33]

जनसांख्यिक ने भारत में मुसलमानों के बीच उच्च जन्म दर के पीछे कई कारकों को बताया है। समाजशास्त्री रोजर और पेट्रीसिया जेफ्फेरी के अनुसार धार्मिक नियतिवाद के बजाय सामाजिक, दो से अधिक विवाह आर्थिक स्थिति को उच्च मुस्लिम जन्म दर के लिए मुख्य कारण मानते है। भारतीय मुसलमान अपने हिन्दू समकक्षों की तुलना में अधिक गरीब और कम शिक्षित हैं।[34] विख्यात भारतीय समाजशास्त्री, बी॰ के॰ प्रसाद का तर्क है कि चूंकि भारत की मुस्लिम आबादी हिंदू समकक्षों की तुलना में शहरी है, मुसलमान शिशु मृत्यु दर करीब 12% है जो कि हिंदुओं की तुलना में अधिक है।[35]

हालांकि, अन्य समाजशास्त्रियों का कहना है कि धार्मिक कारकों को उच्च मुस्लिम जन्म दर समझा सकता है। सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि भारत में मुसलमान, परिवार नियोजन के उपायों को अपेक्षाकृत कम अपनाने को तैयार होते हैं और मुस्लिम महिलाओं में अधिक प्रजनन अवधि होती है क्योंकि हिन्दू महिलाओं की तुलना में उनका विवाह काफी छोटी उम्र में हो जाता है।[36] 1983 में केरल में के॰सी॰ ज़चारिया द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि औसत रूप से मुस्लिम महिलाओं ने 4.1 बच्चों को जन्म दिया था, जबकि एक हिंदू महिला ने केवल 2.9 के औसत से ही बच्चों को जन्म दिया। धार्मिक रिवाज और वैवाहिक प्रथाओं को भी उच्च मुस्लिम जन्म दर के कारणों के रूप में उद्धृत किया गया है। लेकिन भारत के अलावा ये धार्मिक मान्यता अन्य मुस्लिम देशों में नही है ।[37] पॉल कुर्त्ज़ के अनुसार भारत में हिंदूओं की तुलना में मुसलमान आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों के अधिक प्रतिरोधी हैं और परिणाम के रूप में मुस्लिम महिलाओं की तुलना में हिंदू महिलाओं में प्रजनन दर में गिरावट अधिक है।[30][38] 1998-99 में आयोजित राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय मुसलमान दम्पति, भारत के हिन्दू परिवारों की तुलना में अधिक बच्चे पैदा करने को काफी हद तक एक आदर्श मानते हैं।[39] इसी सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि 49 प्रतिशत से भी अधिक हिन्दू परिवार परिवार नियोजन को सक्रिय रूप से मानते हैं जबकि 15 प्रतिशत ही मुसलमान दम्पति परिवार नियोजन को मानते हैं।[39] 1996 में लखनऊ जिले में आयोजित एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 69 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं परिवार नियोजन को अपने धर्म खिलाफ मानती थी जबकि सर्वेक्षण से यह पता चलता है कि कोई हिन्दू महिला परिवार योजना के खिलाफ धर्म को अवरोध नहीं मानती।[39]

भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त 2006 की समिति के अनुसार, भारत की मुस्लिम आबादी 21वीं सदी के अंत में 360-415 मिलियन तक हो जाएगी (या भारत की कुल अनुमानित जनसंख्या का 45 प्रतिशत)।[40] एक प्रमुख भारतीय पत्रकार स्वपन दासगुप्ता ने भारत में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर से संबंधित चिंताओं को उठाया और कहा कि हो सकता है यह भारत के सामाजिक तालमेल को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित कर सकता है।[41] एक प्रसिद्ध भूजनांकिकी फिलिप लोंगमैन ने टिप्पणी की है कि हिंदू और मुसलमान के जन्म दर में पर्याप्त अंतर भारत में जातीय तनाव पैदा कर सकते हैं।[42]

चेरामन पेरूमल जुमा मस्जिद, ऐसा माना जाता है कि रामा वर्मा कुलाशेकरा के अनुरोध पर बनाया गया था और संभवतः भारत का पहला मस्जिद

लोकप्रिय विश्वास के विपरीत, इस्लाम भारत में मुस्लिम आक्रमणों से पहले ही दक्षिण एशिया में आ चुका था। इस्लामी प्रभाव को सबसे पहले अरब व्यापारियों के आगमन के साथ 7वीं शताब्दी के प्रारम्भ में महसूस किया जाने लगा था। प्राचीन काल से ही अरब और भारतीय उपमहाद्वीपों के बीच व्यापार संबंध अस्तित्व में रहा है। यहां तक कि पूर्व-इस्लामी युग में भी अरब व्यापारी मालाबार क्षेत्र में व्यापार करने आते थे, जो कि उन्हें दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ती थी। इतिहासकार इलियट और डाउसन की पुस्तक के अनुसार भारतीय तट पर 630 ई॰ में मुस्लिम यात्रियों वाले पहले जहाज को देखा गया था। पारा रौलिंसन अपनी किताब: [44] में दावा करते हैं कि 7वें ई॰ के अंतिम भाग में प्रथम अरब मुसलमान भारतीय तट पर बसे थे। शेख़ जैनुद्दीन मखदूम “तुह्फत अल मुजाहिदीन” एक विश्वसनीय स्रोत है।[45] इस तथ्य को जे॰ स्तुर्रोक्क द्वारा [46] में माना गया हैऔर हरिदास भट्टाचार्य द्वारा में भी इस तथ्य को प्रमाणित किया गया है।[47] इस्लाम के आगमन के साथ ही अरब वासी दुनिया में एक प्रमुख सांस्कृतिक शक्ति बन गए। अरब व्यापारी और ट्रेडर नए धर्म के वाहक बन गए और जहां भी गए उन्होंने इसका प्रचार किया।[48]

दिल्ली में 1852 के लगभग मुस्लिम पड़ोस.

यह कथित तौर पर माना जाता है कि राम वर्मा कुलशेखर के आदेश पर भारत में प्रथम मस्जिद का निर्माण ई॰ 629 में हुआ था, जिन्हें मलिक बिन देनार के द्वारा केरल के कोडुंगालूर में मुहम्मद (c. 571–632) के जीवन समय के दौरान भारत का पहला मुसलमान भी माना जाता है।[49][50][51]

मालाबार में, मप्पिलास इस्लाम में परिवर्तित होने वाले पहले समुदाय हो सकते हैं क्योंकि वे दूसरों के मुकाबले अरब से अधिक जुड़ें हुए थे। तट के आसपास गहन मिशनरी गतिविधियां चलती रहीं और कई संख्याओं में मूल निवासी इस्लाम को अपना रहे थे। इन नए धर्मान्तरित लोगों को उस समय माप्पीला समुदाय के साथ जोड़ा गया। इस प्रकार मप्पिलास लोगों में हम स्थानीय महिलाओं के माध्यम से अरब लोगों की उत्पत्ति और स्थानीय लोगों में से धर्मान्तरित, दोनों प्रकार को देख सकते हैं।[52]

8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम की अगुवाई में अरब सेना द्वारा सिंध प्रांत (वर्तमान में पाकिस्तान) पर विजय प्राप्त की गई। सिंध, उमय्यद खलीफा का पूर्वी प्रांत बन गया।

10वीं सदी के प्रथम अर्द्ध भाग में गजनी के महमूद ने पंजाब को गज़नविद साम्राज्य में जोड़ा और आधुनिक समय के भारत में कई हमले किए। इन हमलों में लाहौर, पेशावर, सिंध, पंजाब जैसे पश्चिमी भारत पर हमले किए गए। जाति के आधार पर पूरी तरह बंटे छोटी छोटी रियासतों के राजा कासिम और गजनी जैसे विदेशी मुस्लिम हमलावरों का सामना नहीं कर सके और भाग खड़े हुए। गजनी ने बेरहमी के साथ इन इलाकों के मंदिर तोड़ डाले, हिंदू पुरुषों को लाइन में खड़ा कर उनकी गर्दन काट दी गई, मंदिरों में जमा सारा धन लूट लिया गया। इस दौरान जिन लोगों ने दोनों हमलावरों के सामने इस्लाम ग्रहण कर लिया। इस्लाम फैलाने का फरमान सुनाकर दोनों वापस लौट गए। भारत में इस्लाम की यह पहली शुरुआत थी।

12वीं शताब्दी के अंत में एक और अधिक सफल आक्रमण घोर के मुहम्मद द्वारा किया गया था। इस प्रकार अंततः यह दिल्ली सल्तनत के गठन के लिए अग्रसर हुआ।

अरबिया में इस्लाम के आगमन से पहले, इस्लाम के प्रारम्भिक चरणों में भारत और भारतीयों के साथ अरब और मुसलमानों के संपर्क होने से संबंधित पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। अरब व्यापारियों ने भारतीयों द्वारा विकसित अंक प्रणाली को मध्य पूर्व और यूरोप में प्रसारित किया।

आठवीं सदी के प्रारम्भ में कई संस्कृत पुस्तकों का अरबी में अनुवाद किया गया। जॉर्ज सलिबा अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक साइंस एंड द मेकिंग ऑफ द यूरोपियन रेनेसांस’ में लिखते हैं कि “द्वितीय अब्बासिद खलीफा अल- मंसूर [754-775] के शासन के दौरान प्रमुख संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद शुरू किया गया था, अगर उससे पहले नहीं तो; यहां तक कि उससे पहले भी तर्क पर कुछ ग्रंथों का अनुवाद किया गया था और आम तौर पर यह स्वीकार किया गया था कि कुछ फ़ारसी और संस्कृत ग्रंथों को जैसे का तैसा रखा गया था, हालांकि वास्तव में पहले से ही उनका अनुवाद किया जा चुका था”।[53]

भारत में इस्लाम के प्रचार व प्रसार में सूफियों (इस्लामी मनीषियों) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस्लाम के प्रसार में उन्हें काफी सफलता प्राप्त हुई, क्योंकि कई मायने में सूफियों की विश्वास प्रणाली और अभ्यास भारतीय दार्शनिक साहित्य के साथ समान थी, विशेष रूप से अंहिंसा और अद्वैतवाद। इस्लाम के प्रति सूफी रूढ़िवादी दृष्टिकोण ने हिंदुओं को इसका अभ्यास करने के लिए आसान बनाया है। हजरत ख्वाजा मुईन-उद-द्दीन चिश्ती, कुतबुद्दीन बख्तियार खुरमा, निजाम-उद-द्दीन औलिया, शाह जलाल, आमिर खुसरो, सरकार साबिर पाक, शेख अल्ला-उल-हक पन्द्वी, अशरफ जहांगीर सेम्नानी, सरकार वारिस पाक, अता हुसैन फनी चिश्ती ने भारत के विभिन्न भागों में इस्लाम के प्रसार के लिए सूफियों को प्रशिक्षित किया। इस्लामी साम्राज्य के भारत में स्थापित हो जाने के बाद सूफियों ने स्पष्ट रूप से प्रेम और सुंदरता का एक स्पर्श प्रदान करते हुए इसे उदासीन और कठोर हूकुमत होने से बचाया। सूफी आंदोलन ने कारीगर और अछूत समुदायों के अनुयायियों को भी आकर्षित किया; साथ ही इस्लाम और स्वदेशी परंपराओं के बीच की दूरी को पाटने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। नक्शबंदी सूफी के एक प्रमुख सदस्य अहमद सरहिंदी ने इस्लाम के लिए हिंदुओं के शांतिपूर्ण रूपांतरण की वकालत की। इमाम अहमद खान रिदा ने अपनी प्रसिद्ध फतवा रजविया के माध्यम से भारत में पारंपरिक और रूढ़िवादी इस्लाम का बचाव करते हुए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

शिया एक मुसलमान सम्प्रदाय है। सुन्नी सम्प्रदाय के बाद यह इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा सम्प्रदाय है जो पूरी मुस्लिम आबादी का केवल १५% है।[1] सन् ६३२ में हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात जिन लोगों ने ग़दीर की पैग़म्बर मुहम्मद की वसीयत के मुताबिक अपनी भावना से हज़रत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और ख़लीफा (नेता) चुना वो लोग शियाने अली (अली की टोली वाले) कहलाए जो आज शिया कहलाते हैं। लेकिन बहोत से सुन्नी इन्हें “शिया” या “शियाने अली” नहीं बल्कि “राफज़ी” (अस्वीकृत लोग) नाम से बुलाते हैं ! वहीं शिया सम्प्रदाय के लोग भी प्रसिद्ध हदीस “अकमलतो लकुम दिनोकुम” की पूरी व्याख्या के आधार पर उन लोगों को पथभ्रष्ट और अल्लाह का नाफरमान मानते हैं , जो पैग़म्बर मुहम्मद के तुरंत पश्चात अली को इमाम यानी खलीफा या प्रमुख ना मानें !

इस धार्मिक विचारधारा के अनुसार हज़रत अली, जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद दोनों थे, ही हजरत मुहम्मद साहब के असली उत्तराधिकारी थे और उन्हें ही पहला ख़लीफ़ा (राजनैतिक प्रमुख) बनना चाहिए था। यद्यपि ऐसा हुआ नहीं और उनको तीन और लोगों के बाद ख़लीफ़ा, यानि प्रधान नेता, बनाया गया। अली और उनके बाद उनके वंशजों को इस्लाम का प्रमुख बनना चाहिए था, ऐसा विशवास रखने वाले शिया हैं। सुन्नी मुसलमान मानते हैं कि हज़रत अली सहित पहले चार खलीफ़ा (अबु बक़र, उमर, उस्मान तथा हज़रत अली) सतपथी (राशिदुन) थे जबकि शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के अवैध तरीके से चुने हुए और ग़लत प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं और इस गिनती में ख़लीफ़ा शब्द का प्रयोग नहीं करते। सुन्नी मुस्लिम अली को (चौथा) ख़लीफ़ा भी मानते है और उनके पुत्र हुसैन को मरवाने वाले यज़ीद को कई जगहों पर पथभ्रष्ट मुस्लिम कहते हैं।

इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का बहुमत मुख्य रूप से इरान,इराक़,बहरीन और अज़रबैजान में रहते हैं। इसके अलावा सीरिया, कुवैत, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ओमान, यमन तथा भारत में भी शिया आबादी एक प्रमुख अल्पसंख्यक के रूप में है। शिया इस्लाम के विश्वास के तीन उपखंड हैं – बारहवारी, इस्माइली और ज़ैदी। एक मशहूर हदीस मन्कुनतो मौला फ़ हा जा अली उन मौला, जो मुहम्मद साहब ने गदीर नामक जगह पर अपने आखरी हज पर खुत्बा दिया था

सैयद फैयाज अली जैदी के बेटे सैयद हैदर अली जैदी और फिर सैयद हैदर अली जैदी के बेटे सैयद अशरफ अली जैदी और फिर सैयद अशरफ अली जैदी के बेटे सैयद अफजाल हुसैन जैदी और सैयद अफजाल हुसैन जैदी के बेटे सैयद शमीम अब्बास जैदी और सैयद शमीम अब्बास जैदी के बेटे सैयद अफजाल अब्बास जैदी जो मिशन हुसैन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं शिया समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अहले सुन्नत वल जमात अथवा सुन्नी बरेलवी (उर्दू: بریلوی) दक्षिण एशिया में सूफी आंदोलन के अंतर्गत एक उप-आंदोलन को कहा जाता है जिसे उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के भारत में रोहेलखंड स्थित बरेली से सुन्नी विद्वान अहमद रजा खान ने प्रारंभ किया था,। बरेलवी हनफ़ी मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा है जो अब बडी संख्या में भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान दक्षिण अफ्रीका एवं ब्रिटेन में संघनित हैं। इमाम अहमद रजा खान ने अपनी प्रसिद्ध फतवा रजविया के माध्यम से भारत में पारंपरिक और रूढ़िवादी इस्लाम का बचाव करते हुए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बरेलवी एक नाम दिया गया है सुन्नी मुसलमान जो सूफिज्म में विश्वास रखते हैं और सैकड़ों बरसों से इस्लाम सुनियत के मानने वाले हैं उनको आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान के लगाव की वजह से बरेलवी बोलते हैं!

इस्लामी दुनिया में दारूल उलूम देवबन्द का एक विशेष स्थान है जिसने पूरे क्षेत्र को ही नहीं, पूरी दुनिया के मुसलमानों को प्रभावित किया है। दारूल उलूम देवबन्द केवल इस्लामी विश्वविद्यालय ही नहीं एक वहाबी विचाराधारा है,! इसलिए मुसलमानों में इस विखराधारा से प्रभावित मुसलमानों को ‘‘देवबन्दी‘‘ कहा जाता है। देवबन्द उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण नगरों में गिना जाता है जो आबादी के लिहाज़ से तो एक लाख से कुछ ज्यादा आबादी का एक छोटा सा नगर है। लेकिन दारूल उलूम ने इस नगर को बडे-बडे नगरों से भारी व सम्मानजनक बना दिया है, जो ना केवल अपने गर्भ में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है, अपितु आज भी साम्प्रदायिक सौहार्दद धर्मनिरपेक्षता एवं देश-प्रेम का एक अजीब नमूना प्रस्तुत करता है। देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति व इस्लामी शिक्षा एवं संस्कृति में जो समन्वय आज हिन्दुस्तान में देखने को मिलता है उसका सीधा-साधा श्रेय देवबन्द दारूल उलूम को जाता है। यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व वहाबी इस्लामी शिक्षा का केन्द्र बिन्दु है। दारूल उलूम ने न केवल इस्लामिक शोध व साहित्य के संबंध में विशेष भूमिका निभायी है, बल्कि भारतीय पर्यावरण में इस्लामिक सोच व संस्कृति को नवीन आयाम तथा अनुकूलन दिया है। दारूल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानोतवी द्वारा रखी गई थी। वह समय भारतक के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेजों के विरूद्ध लडे गए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी ना पाये थे और अंग्रजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रजों ने अपने संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गए थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के पृहार होने लगे थे। चारों ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जासे, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्षा जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्ष की जाए। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज एस समय तक विशाल एवं जालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुकाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाए। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवशयकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवशयकता थी जो धर्म व जाति से ऊपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें। इन्हीं उददेश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढाया उनमें दारूल उलूम देवब्नद के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीय मौलाना महमूद हसन (विख्यात अध्यापक व संरक्षक दारूल उलूम देवबन्द) उन सैनानियों में से एक थे जिनके कलम, ज्ञान, आचार व व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेखुल हिन्द (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभेषित किया गया था, उन्होंने न केवल भारत में वरन विदेशों (अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र) में जाकर भारत व ब्रिटिश साम्राज्य की भ्रत्‍सना की और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध जी खोलकर अंग्रेजी शासक वर्ग की मुखालफत की। बल्कि शेखुल हिन्द ने अफगानिस्तान व ईरान की हकूमतों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उदाहरणतयः यह कि उन्होंने अफगानिस्तान व ईरान को इस बात पर राजी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राजय के विरूद्ध लडने पर तैयार हो तो जमीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे। शेखुल हिन्द ने अपने सुप्रिम शिष्यों व प्रभावित व्यक्तियों के माध्यम से अंग्रेज के विरूद्ध प्रचार आरंभ किया और हजारों मुस्लिम आंदोलनकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध चल रहे राष्टीय आंदोलन में शामिल कर दिया। इनके प्रमुख शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्ला सिंधी थे जो जीवन पर्यन्त अपने गुरू की शिक्षाओं पर चलते रहे और अपने देशप्रमी भावनाओं व नीतियों के कारण ही भारत के मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों व आंदोलनकारियों में एक भारी स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं। सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफगानिस्तात जाकर अंग्रजों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की सर्वप्रथम स्वतंत्रत सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना दिया। यहीं पर रहकर उन्होंने इंडियन नेशनल कांगेस की एक शाखा कायम की जो बाद में (1922 ई.) में मूल कांग्रेस संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय कर दी गई। शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज (सउदी अरब का पहला नाम था) चले गए, उन्होंने वहाँ रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की। सन 1916 ई. में इसी संबंध में शेखुल हिन्द इस्तम्बूल जाना चाहते थे। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब तैनात था शेखुल हिन्द को इस्तम्बूल के बजाये तुर्की जाने के लिए कहा परन्तु उसी समय तुर्की के युद्ध मंत्री अनवर पाशा हिजाज पहुँच गए। शेखुल हिन्द ने उनसे मुलाकात की और अपने आंदोलन के बारे में बताया। अनवर पाशा ने भारतीयों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और अंग्रेज साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध करने की एक गुप्त योजना तैयार की। हिजाज से यह गुप्त योजना, गुप्त रूप से शेखुल हिन्द ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्ला सिंधी को अफगानिसतान भेजा, मौलाना सिंधी ने इसका उत्तर एक रेशमी रूमाल पर लिखकर भेजा, इसी प्रकार रूमालों पर पत्र व्यवहार रहा। यह गुप्त सिलसिला ‘‘तहरीक ए रेशमी रूमाल‘‘ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इसके सम्बंध में सर रोलेट ने लिखा है कि ‘‘ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों पर हक्का बक्‍का थी‘‘। दारूल उलूम देवबंद के पास आज अपने कई बड़े बड़े भवन हैं जिनमें कई मस्जिदें भी हैं लेकिन दारूल उलूम देवबंद के पास शुरू में अपना कोई भवन न था बल्कि इसकी शुरूआत ‘छत्ते वाली मस्जिद‘ से हुई। इसके आंगन में एक अनार का पेड़ था। इसके नीचे एक उस्ताद ने एक शागिर्द को पढ़ाने से इस मदरसे की शुरूआत की। वह अनार का पेड़ सौ साल से भी ज़्यादा अर्सा बीत जाने के बावजूद फल देता रहा जो कि एक आश्चर्य का विषय था। यह मस्जिद आज भी दारूल उलूम देवबंद के मुख्य भवन के मुख्य दरवाज़े के पास स्थित है और इसमें आज भी पांचों समय पाबंदी से नमाज़ अदा की जाती है। इस मस्जिद में कुछ कमरे भी बने हुए हैं। दारूल उलूम से जुड़ी हुई अहम शख्सियतें अक्सर यहाँ क़ियाम करती हैं।

टीपू सुल्तान, जिसे टाइगर ऑफ मैसूर के रूप में जाना जाता है, प्रमुख भारतीय राजाओं में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई की थी।

अंग्रेजों के खिलाफ भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रान्तिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान प्रलेखित है। तीतू मीर ने ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह किया था। मौलाना अबुल कलाम आजाद, हकीम अजमल खान और रफी अहमद किदवई ऐसे मुसलमान हैं जो इस उद्देश्य में शामिल थे।

शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश के अशफाक उल्ला खाँ (उर्दू: اشفاق اُللہ خان), (अंग्रेजी:Ashfaq Ulla Khan) (जन्म:1900,मृत्यु:1927) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर सन् 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका कर मार दिया गया। राम प्रसाद बिस्मिल की भाँति अशफाक उल्ला खाँ भी उर्दू भाषा के बेहतरीन शायर थे। उनका उर्दू ‘तखल्लुस’, जिसे हिन्दी में उपनाम कहते हैं, ‘हसरत’ था। उर्दू के अतिरिक्त वे हिन्दीअँग्रेजी में लेख एवं कवितायें भी लिखा करते थे। उनका पूरा नाम अशफाक उल्ला खाँ वारसी ‘हसरत’ था। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सम्पूर्ण इतिहास में ‘बिस्मिल’ और ‘अशफाक’ की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता[54] का अनुपम आख्यान है।

खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी के रूप में प्रसिद्ध) एक महान राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अपने 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताया; भोपाल के बरकतुल्लाह के संस्थापकों में से एक थे जिसने ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था; ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई); फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था; केरल के अब्दुल वक्कोम खदिर ने 1942 के ‘भारत छोड़ो’ में भाग लिया और 1942 में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी, उमर सुभानी जो की बंबई की एक उद्योगपति करोड़पति थे, उन्होंने गांधी और कांग्रेस व्यय प्रदान किया था और अंततः स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को कुर्बान कर दिया। मुसलमान महिलाओं में हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है।

1498 की शुरुआत से यूरोपीय देशों की नौसेना का उदय और व्यापार शक्ति को देखा गया क्योंकि वे भारतीय उपमहाद्वीप पर तेजी से नौसेना शक्ति में वृद्धि और विस्तार करने में रूचि ले रहे थे। ब्रिटेन और यूरोप में औद्योगिक क्रांति के आगमन के बाद यूरोपीय शक्तियों ने मुगल साम्राज्य का पतन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकीय और वाणिज्यिक लाभ प्राप्त किया था। उन्होंने धीरे-धीरे इस उपमहाद्वीप पर अपने प्रभाव में वृद्धि करना शुरू किया।

हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया। बहरहाल, 1799 में टीपू सुल्तान अंततः श्रीरंगापटनम में पराजित हुए। बंगाल में नवाब सिराजुद्दौला ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तारवादी उद्देश्य का सामना किया और ब्रिटिशों से युद्ध किया। हालांकि, 1757 में वे प्लासी की लड़ाई में हार गए।

मौलाना आजाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता और हिन्दू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे। यहां 1940 में सरदार पटेल और महात्मा गांधी के साथ आजाद (बांए) को दिखाया गया है।

ब्रिटिश के खिलाफ पहले भारतीय विद्रोही को 10 जुलाई 1806 के वेल्लोर गदर में देखा गया जिसमें लगभग 200 ब्रिटिश अधिकारी और सैनिकों को मृत या घायल के रूप में पाया गया। लेकिन ब्रिटिश द्वारा इसका बदला लिया गया और विद्रोहियों और टीपू सुल्तान के परिवार वालों को वेल्लोर किले में बंदी बनाया गया और उन्हें उस समय इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है। प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा ‘गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स’ के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).

जैसे-जैसे मुगल साम्राज्य समाप्त होने लगा वैसे-वैसे मुसलमानों की सत्ता भी समाप्त होने लगी और भारत के मुसलमानों को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ा – तकनीकी रूप से शक्तिशाली विदेशियों के साथ संपर्क बनाते हुए अपनी संस्कृति की रक्षा और उसके प्रति रूचि जगाना था। इस अवधि में, फिरंगी महल के उलामा ने जो बाराबंकी जिले में सबसे पहले सेहाली में आधारित था और 1690 के दशक से लखनऊ में आधारित था, मुसलमानों को निर्देशित और शिक्षित किया। फिरंगी महल ने भारत के मुसलमानों का नेतृत्व किया और आगे बढ़ाया। दारुल उलूम-, देवबंद (उत्तर प्रदेश) के मौलाना और मौलवी (धार्मिक शिक्षक) भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और घोषणा की कि भी एक अन्यायपूर्ण शासन की अधीनता करना इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ है।

अन्य प्रसिद्ध मुसलमान जिन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ आजादी के युद्ध में भाग लिया वे हैं; मौलाना अबुल कलाम आजाद, दारूल उलूम देवबंद के मौलाना महमूद हसन जिन्हें एक सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से अंग्रेजों की पराजय के लिए प्रसिद्ध सिल्क लेटर षडयंत्र में दोषी ठहराया गया था, हुसैन अहमद मदनी, दारुल उलूम देवबंद पूर्व शेकहुल हदिथ, मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी, हकीम अजमल खान, हसरत मोहनी डा। सैयद महमूद, प्रोफेसर मौलवी बरकतुल्लाह, डॉ॰ जाकिर हुसैन, सैफुद्दीन किचलू, वक्कोम अब्दुल खदिर, डॉ॰ मंजूर अब्दुल वहाब, बहादुर शाह जफर, हकीम नुसरत हुसैन, खान अब्दुल गफ्फार खान, अब्दुल समद खान अचकजई, शाहनवाज कर्नल डॉ॰ एम॰ ए॰ अन्सरी, रफी अहमद किदवई, फखरुद्दीन अली अहमद, अंसार हर्वानी, तक शेरवानी, नवाब विक़रुल मुल्क, नवाब मोह्सिनुल मुल्क, मुस्त्सफा हुसैन, वीएम उबैदुल्लाह, एसआर रहीम, बदरुद्दीन तैयबजी और मौलवी अब्दुल हमीद.

1930 में गांधी के साथ खान अब्दुल गफ्फार खान। इसके अलावा फ्रंटियर गांधी के रूप में भी जाने जाते हैं, खान ने ब्रिटिश राज के खिलाफ गैर हिंसक विरोध का नेतृत्व किया और दृढ़ता से भारत के विभाजन का विरोध किया।

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1930 के दशक तक, मुहम्मद अली जिन्ना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे और स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे। कवि और दार्शनिक, डॉ॰ सर अल्लामा मुहम्मद इकबाल हिंदू – मुस्लिम एकता और 1920 के दशक तक अविभाजित भारत के एक मजबूत प्रस्तावक थे। अपने प्रारम्भिक राजनीतिक कैरियर के दौरान हुसेन शहीद सुहरावर्दी भी बंगाल में राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय थे। मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली ने समग्र भारतीय सन्दर्भ में मुसलमानों के लिए मुक्ति के लिए संघर्ष और महात्मा गांधी और फिरंगी महल मौलाना अब्दुल के साथ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। 1930 के दशक तक भारत के मुसलमानों ने मोटे तौर पर एक अविभाजित भारत के समग्र सन्दर्भ में अपने देशवासियों के साथ राजनीति की।

1920 के दशक के उत्तरार्ध में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को अलग-अलग दृष्टिकोण से मान्यता दी गई और डॉ॰ सर अल्लामा मोहम्मद इकबाल ने 1930 के दशक में भारत में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की। नतीजतन, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने एक अलग मुस्लिम देश बनाने की मांग की। 1940 में लाहौर में इस मांग को उठाया गया (इसे पाकिस्तान रिजुलेशन के रूप में जाना जाता है)। उसके बाद डॉ॰ सर अल्लामा मुहम्मद इकबाल की मृत्यु हो गई और मुहम्मद अली जिन्ना, नवाबजादा लियाकत अली खान, हुसेन शहीद सुहरावर्दी और कई अन्य नेताओं ने पाकिस्तान आंदोलन का नेतृत्व किया।

प्रारंभ में, मुसलमानों द्वारा स्वायत्त शासित क्षेत्रों के साथ अलग मुस्लिम देश (एस) के लिए मांग बड़े, स्वतंत्र, अविभाजित भारत के एक ढांचे के भीतर थी। साथ ही भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए अन्य विकल्प भी था और एक मुक्त, अविभाजित भारत में पर्याप्त संरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व आदि पर भी बहस की जा रही थी। हालांकि, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के बीच अंग्रेजी साम्राज्य से शीघ्र स्वतंत्रता मांगने को लेकर जब आपस में कोई आम सहमति नहीं बन पाई तब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने स्पष्ट रूप से पूर्ण स्वतंत्र, संप्रभु देश, पाकिस्तान की मांग पर जोर दिया।

भारत ऐसे कई प्रख्यात मुसलमानों का गढ़ है जिन्होंने कई क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है और भारत की आर्थिक वृद्धि और दुनिया भर में सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ने में एक रचनात्मक भूमिका निभाई है।

स्वतंत्र भारत के 12 राष्ट्रपतियों में से तीन मुसलमान थे – जाकिर हुसैन डॉ॰ अहमद फखरुद्दीन अली और डॉ॰ ए० पी० जे० अब्दुल कलाम। इसके अलावा, स्वतंत्रता के बाद से विभिन्न अवसरों पर मोहम्मद हिदायतुल्ला, ए० एम० अहमदी और मिर्जा हमीदुल्लाह बेग, चीफ जस्टीस ऑफ इंडिया के पद पर प्रतिष्ठित रहे हैं।

भारत के भूतपुर्व उपराष्ट्रपति, मोहम्मद हामिद अंसारी मुस्लिम हैं। प्रमुख भारतीय नौकरशाहों और राजनयिकों में आबिद हुसैन और आसफ अली शामिल हैं। भारत के प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं में शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला , मुफ्ती मोहम्मद सईद, सिकंदर बख्त, ए० आर० अंतुले, सी० एच० मोहम्मद कोया, मुख्तार अब्बास नकवी, वरिष्ठ पत्रकार अफजाल अब्बास जैदी(राष्ट्रीय अध्यक्ष मिशन-ए-हुसैन),सलमान खुर्शीद, सैफुद्दीन सोज़, ई० अहमद, गुलाम नबी आजाद और सैयद शाहनवाज हुसैन शामिल हैं। भारतीय राज्यों के सात मुस्लिम मुख्य मंत्री (जम्मू-कश्मीर के अलावा) रहे हैं:

मुंबई आधारित बॉलीवुड में कुछ लोकप्रिय और प्रभावशाली अभिनेता और अभिनेत्रियां मुसलमान हैं। इनमें यूसुफ खान (पर्दे पर दिलीप कुमार),[55] शाहरुख खान,[56] आमिर खान,[57] सलमान खान,[58] सैफ अली खान,[59][59][60] मधुबाला,[61] कैटरीना कैफ और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी[62] शामिल हैं। भारत में ऐसे कई मुस्लिम अभिनेता भी हैं जिन्हें समीक्षकों द्वारा प्रशंसा प्राप्त है, इनमें नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी[63] वहीदा रहमान,[64] इरफान खान, फरीदा जलाल, अरशद वारसी, महमूद, जीनत अमान, फारूक शेख और तब्बू शामिल हैं।

भारतीय मुसलमान भारत में कला प्रदर्शन के अन्य रूपों में भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं विशेष रूप से संगीत, आधुनिक कला और थिएटर में। एम॰एफ॰ हुसैन को भारत के सबसे प्रसिद्ध समकालीन कलाकार के रूप में जाना जाता है और अकादमी पुरस्कार विजेता रेसुल पुकुट्टी और ए॰आर॰ रहमान भारत के महान संगीतकारों में से एक हैं। प्रमुख कवियों और गीतकारों में जावेद अख्तर को शामिल किया जाता है जिन्होंने अपनी प्रतिभा के लिए कई फिल्म फेयर पुरस्कार अर्जित किया है। अन्य लोकप्रिय मुसलमान जाति के भारतीय संगीतकारों और गायकों में मोहम्मद रफी, अनु मलिक, लकी अली और तबला वादक जाकिर हुसैन शामिल हैं।

हैदराबाद से सानिया मिर्जा उच्चतम रैंक की टेनिस खिलाड़ी हैं और व्यापक रूप से भारत में उन्हें युवाओं का आदर्श माना जाता है। क्रिकेट (भारत का सबसे लोकप्रिय खेल) में कई मुस्लिम खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। इस्लाम को मानने वाले कुछ पूर्व क्रिकेटर मुश्ताक अली, नवाब पटौदी और मोहम्मद अजहरुद्दीन हैं। मौजूदा भारतीय क्रिकेट टीम में जहीर खान, इरफान पठान और यूसुफ पठान जैसे कई मुस्लिम खिलाड़ी हैं। भारत में अन्य प्रमुख मुस्लिम क्रिकेटरों में मोहम्मद कैफ और वसीम जाफर हैं।

अजीम प्रेमजी, भारत की तीसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी विप्रो टेक्नोलॉजीज के सीईओ और 17.1 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित संपत्ति के साथ भारत में 5 वें स्थान के सबसे अमीर आदमी[65] हैं।

भारत में कई प्रभावशाली मुस्लिम व्यापारी हैं। विप्रो, वॉकहार्ट, हमदर्द लेबोरेटोरिज, सिप्ला और मिर्जा टेनर्स जैसी प्रमुख भारतीय कंपनियों की स्थापना मुस्लिम द्वारा की गई है। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा दक्षिण एशिया के केवल दो मुस्लिम अरबपतियों यूसुफ हामिद और अजीम प्रेमजी का नाम उल्लिखित किया गया है।

भारतीय सशस्त्र बलों में हिंदुओं और सिखों की तुलना में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम है।[66] फिर भी कई भारतीय सैन्य मुस्लिम कर्मियों को राष्ट्र के प्रति उनकी असाधारण सेवा के लिए वीरता पुरस्कार और उच्च रैंक से सम्मानित किया गया है। भारतीय सेना के अब्दुल हमीद को 1965 में असल उत्तर के युद्ध के दौरान एक रिकोइलेस बंदूक द्वारा सात पाकिस्तानी टैंकों को उड़ा देने के लिए भारत के उच्चतम पुरस्कार, परम वीर चक्र से नवाज़ा गया।[67][68] दो अन्य मुसलमान – ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान और मोहम्मद इस्माइल – को 1947 के इंडो-पाकिस्तानी युद्ध के दौरान उनकी सेवाओं के लिए महावीर चक्र दिया गया।[69] भारतीय सशस्त्र बलों में उच्च रैंकिंग के मुसलमानों में लेफ्टिनेंट जनरल जमील महमूद (भारतीय सेना में पूर्व जीओसी-इन-सी के पूर्वी कमान)[70] और मेजर जनरल मोहम्मद अमीन नायक शामिल हैं।[71]

डॉ॰ अब्दुल कलाम, भारत के सर्वाधिक सम्मानित वैज्ञानिक भारत के इंटेग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के (आईजीएमडीपी) जनक हैं और उन्हें भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप नियुक्ति देकर सम्मानित किया गया।[72] रक्षा उद्योग में उनके अभूतपूर्व योगदान के चलते उन्हें की उपाधि दी गई[73] और भारत के राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उन्हें प्यार से कहा जाता था। डॉ॰ एस॰ जे॰ कासिम, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक थे और उन्होंने अंटार्कटिका के पहले वैज्ञानिक अभियान के माध्यम से भारत का नेतृत्व किया और दक्षिण गंगोत्री की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही वे जामिया मिलिया इस्लामिया के पूर्व कुलपति, महासागर विकास विभाग के सचिव और भारत में पोलर रिसर्च के संस्थापक हैं।[74] अन्य प्रमुख मुस्लिम वैज्ञानिकों और इंजीनियरों में सी॰एम॰ हबीबुल्ला, डेक्कन कॉलेज ऑफ मेडीकल साइंसेस एंड एलाएड हॉस्पीटल और सेंटर फॉर लीवर रिसर्च एंड डाइग्नोस्टिक, हैदराबाद के एक स्टेम सेल के वैज्ञानिक और निर्देशक हैं;[75] मुशाहिद हुसैन, जामिया मिलिया इस्लामिया के उल्लेखनीय भौतिक विज्ञानी और प्रोफेसर हैं; और डॉ॰ इसरार अहमद, सैद्धांतिक भौतिकी के लिए इंटरनेशनल सेंटर के एक सहयोगी सदस्य हैं, शामिल हैं। यूनानी चिकित्सा क्षेत्र में, हाकिम अजमल खान, हाकिम अब्दुल हमीद और हकीम सैयद रहमान जिल्लुर का नाम काफी प्रसिद्ध है।

जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय द्वारा सबसे प्रभावशाली मुसलमानों की सूची में अहले सुन्नत सूफी नेता हजरत सैयद मोहम्मद अमीन मियां कौद्री और शेख अहमद अबूबक्कर मुस्लियर सूची में शामिल किया गया है। सांसद और जमीयत उलेमा ए हिंद के नेता मौलाना महमूद मदनी को दक्षिण एशिया में आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन की शुरूआत करने के लिए 36वां स्थान दिया गया था।[76] सैयद अमीन मियां का सूची में 44वां स्थान था।

आगरा में ताज महल भारत के सबसे प्रतिष्ठित स्मारकों में से एक है।

बीजापुर में गोल गुंबज़, बाइज़ंटाइन हेगिया सोफ़िया के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पूर्वाधुनिक गुंबद.

दिल्ली में हुमायूं का मकबरा, भारत.

बहाउद्दीन मकबरा, जूनागढ़ के वज़ीर का मकबरा.

12वीं सदी के अंत में भारत में इस्लामी शासन के आगमन के साथ ही भारतीय वास्तुकला ने एक नया रूप धारण किया। भारतीय वास्तुकला में जो नए तत्व शामिल हुए वे हैं: आकार का इस्तेमाल (प्राकृतिक स्वरूपों के स्थान पर); सजावटी अभिलेख या सुलेख का उपयोग करते हुए शिलालेखात्‍मक कला; जड़ने वाली सजावट और रंगीन संगमरमर, पेंट प्लास्टर और चमकीले रंग के चमकते हुए टाइलों का इस्तेमाल 1193 ई॰ में निर्मित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद भारतीय उपमहाद्वीप में बनने वाली पहली मस्जिद थी, इसके आसपास “टॉवर ऑफ विक्टरी”, कुतुब मीनार का निर्माण भी लगभग 1192 ई॰में शुरू किया गया था, जो कि स्थानीय राजपूत राजा पर गजनी, अफगानिस्तान के मुहम्मद गोरी और उनके जनरल कुतबुद्दीन ऐबक की जीत को चिह्नित करता है, वर्तमान में यह दिल्ली में यूनेस्को विश्व विरासत साइट है।

स्वदेशी भारतीय वास्तुकला के विपरीत जो कि पट या सीधे क्रम की थी अर्थात सभी रिक्त स्थान क्षैतिज बीम के माध्यम से फैले रहते थे, इस्लामी वास्तुकला धनुषाकार थी यानी एक मेहराब या गुंबद का इस्तेमाल रिक्त स्थान में पूल बनाने की योजना के रूप में अपनाया गया था। मेहराब या गुंबद की अवधारणा मुसलमानों द्वारा आविष्कृत नहीं थी, लेकिन उनके द्वारा उधार ली गई थी और बाद में उनके द्वारा पूर्व रोमन काल की स्थापत्य शैली से अलग करते हुए उसमें और सुधार किया गया। पहले-पहले भारत में भवनों के निर्माण में मुसलमान मोर्टार के रूप में एक सिमेंटिंग एजेंट का इस्तेमाल करते थे। बाद में भी भारत में निर्माण कार्यों में वे कुछ वैज्ञानिक और यांत्रिक सूत्रों का इस्तेमाल करते थे जो कि अन्य सभ्यताओं के उनके अनुभव से प्राप्त था। वैज्ञानिक सिद्धांतों के इस प्रयोग से अधिक मजबूती और निर्माण सामग्री की स्थिरता प्राप्त करने में केवल मदद ही नहीं मिलती थी बल्कि वास्तुकारों और बिल्डरों को और अधिक लचीलापन भी मिलता था। यहां पर एक तथ्य जिस पर जोर दिया जाना चाहिए यह है कि, भारत में इन्हें पेश करने से पहले वास्तुकला के इस्लामी तत्वों को मिस्र, ईरान और इराक जैसे अन्य देशों में विभिन्न प्रयोगात्मक चरणों के माध्यम से पारित किया गया था। इन देशों में अधिकांश इस्लामिक स्मारकों के विपरीत जिसमें बड़े पैमाने पर ईंट प्लास्टर और मलबे का इस्तेमाल निर्माण कार्य में किया गया था, भारत और इस्लामी स्मारकों में तैयार किए गए पत्थरों से बने ठेठ मोर्टार-चिनाई कार्य होता था। इस बात पर बल देना जरूरी है कि भारत-इस्लामी वास्तुकला का विकास अधिकांशतः भारतीय कारीगरों के ज्ञान और कौशल द्वारा किया गया था, जिन्होंने कई शताब्दियों के दौरान पाषाण कारीगरी में महारत प्राप्त की थी और उन्होंने भारत में इस्लामी स्मारकों के निर्माण में अपने अनुभवों का इस्तेमाल किया।

भारत में इस्लामी वास्तुकला को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष। मस्जिद और मकबरे धार्मिक वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि महल और किले धर्मनिरपेक्ष इस्लामी वास्तुकला के उदाहरण हैं। किले अनिवार्य रूप से व्यवहारिक थे और जिसके भीतर एक छोटी सी पूर्ण बस्ती होती थी और दुश्मनों को पीछे हटाने के लिए विभिन्न किलेबंदी संलग्न थी।

मस्जिद: मॉस्क या मस्जिद अपने सरलतम रूप में मुस्लिम कला का प्रदर्शन है। मूल रूप से मस्जिद घिरे हुए पिलरों के बीच एक खुला हुआ बरामदा होता है, जिसके ऊपर एक गुंबद होता है। , नमाज के लिए दिशा का संकेत करती है। के दांए ओर या पल्पिट होता है जहां से कार्यवाही का संचालन करते हैं। एक ऊंचा स्थान, आमतौर पर मीनार होती है जहां से आस्थावानों को नमाज के लिए शामिल किया जाता है, जो कि मस्जिद का एक अचल हिस्सा होता है। बड़ी मस्जिद जहां श्रद्धालु शुक्रवार की नमाज के लिए इकट्ठा होते हैं उसे जामा मस्जिद कहा जाता है।

कब्रिस्तान: यद्यपि वास्तव में यह प्राकृतिक रूप से धार्मिक नहीं है, कब्र या मकबरा ने संपूर्ण रूप से नई वास्तुकला की अवधारणा की शुरूआत की है। मस्जिद को मुख्य रूप से इसकी सादगी के लिए जाना जाता है, जबकि एक कब्र साधारण (औरंगजेब की कब्र) से लेकर एक भव्य संरचना ताजमहल तक होती है। आमतौर पर कब्र, एक एकान्त कक्ष या कब्र कक्ष होती है जिसे के रूप में जाना जाता है जिसके केंद्र में स्मारक या होता है। पूरी संरचना को एक विस्तृत गुंबद द्वारा आवृत्त किया जाता है। भूमिगत कक्ष में मुर्दाघर या होता है जिसमें एक लाश को समाधि या में दफन किया जाता है। छोटे कब्रों में हो सकते हैं, हालांकि बड़े मकबरों में मुख्य मकबरे से थोड़ी ही दूरी पर एक अलग मस्जिद होती है। सामान्य रूप से पूरा मकबरा परिसर या एक बाड़े द्वारा घिरा होता है। मुस्लिम संत के कब्र को दरगाह कहा जाता है। कुरान के अनुसार लगभग सभी इस्लामी स्मारकों का इस्तेमाल मुफ्त होता है और अधिकांश समय दीवारों, छत, खंभे और गुंबदों पर मिनट विवरण नक्काशी में खर्च किए जाते थे।

भारत में इस्लामी स्थापत्य को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है: दिल्ली या इम्पीरियल शैली (1191 1557 ई.); प्रांतीय शैली, डेक्कन और जौनपुर जैसे आस-पास के क्षेत्रों को शामिल किया जाता है; और मुगल स्थापत्य शैली (1526 को 1707 ई.),[77]

भारत में मुसलमान “मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं।”[78] यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है।[79] आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान उन स्थानों में सुन्नी कानून से अलग है जहां बाद में सुन्नी कानून से शिया कानून अलग हैं। हालांकि, वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया।[80]

भारतीय संविधान, बिना धर्म का विचार किए सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की सिफारिश करता है। हालांकि, देश में लगातार राजनीतिक नेतृत्वों ने समान नागरिक संहिता के तहत भारतीय समाज को एकीकृत करने के प्रयासों का जोरदार विरोध किया है और भारतीय मुसलमानों द्वारा इसे देश के अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार भारत में एक अद्वितीय स्थिति मौजूद है जहां एक धर्मनिरपेक्ष कानून का समर्थन करने वालों को फांसीवादी माना जाता है जबकि जो भारतीय मुसलमानों के लिए शरीयत का समर्थन करते हैं उन्हें धर्मनिरपेक्ष के रूप में समझा जाता है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना “मुस्लिम पर्सनल लॉ” यानी भारत में शरीयत अनुप्रयोग अधिनियम, सुरक्षा और प्रयोज्यता जारी के लिए किया गया था।

इस्लाम में धर्मांतरण को लेकर विद्वानों और सार्वजनिक राय, दोनों में काफी विवाद मौजूद है और आमतौर निम्नलिखित विचारधाराओं द्वारा प्रदर्शित होता है:[81]

  1. मुसलमानों का अधिकांश हिस्सा ईरानी पठार या अरब प्रवासियों का वंशज नहीं हैं।[82]
  2. व्यवहारिकता और संरक्षण जैसे गैर धार्मिक कारणों से हुए धर्मांतरण जैसे सत्तारूढ़ मुस्लिम कुलीन के बीच सामाजिक गतिशीलता या करों से मुक्ति के लिए। [81][82]
  3. सुन्नी सूफ़ी संतों की गतिविधियों के कारण हुए धर्मांतरण और जिसमें एक वास्तविक हृदय परिवर्तन शामिल था।[81]
  4. बौद्धों से आया धर्मांतरण और सामाजिक मुक्ति और दमनकारी हिंदू जाति की बाध्यताओं की अस्वीकृति स्वरूप निम्न जाती समूहों द्वारा सामूहिक धर्मांतरण.[82]
  5. एक संयोजन, शुरू में दबाव के तहत और जिसके बाद वास्तविक हृदय परिवर्तन हुआ[81]
  6. प्रमुख मुस्लिम सभ्यता और वैश्विक राज्य व्यवस्था में एक विस्तृत अवधि के दौरान विसरण और एकीकरण की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में.[82]

एक विदेशी आरोपण के रूप में इस्लाम की स्थिति और विरोध करने वाले मूल निवासियों की स्वाभाविक रूप से हिन्दू हैसियत इन बातों में निहित है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण की परियोजना विफल हो गई और विभाजन की राजनीति और भारत में सांप्रदायिकता काफी उलझ गई।[81] मुस्लिम इतिहास और जनसांख्यिकीय गणना के आधार पर मारे गए लोगों की अनुमानित संख्या के.एस. लाल की पुस्तक में दी गई है जिन्होंने दावा किया कि 1000 ई. और 1500 ई. के बीच हिन्दुओं की जनसंख्या करीब 80 मिलियन कम हुई। पूर्व-जनगणना काल में सही डेटा की कमी और इसकी कार्यावली के लिए कई आलोचकों ने उनकी पुस्तक की आलोचना की जैसे सिमोन डिग्बी (स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज) और इरफान हबीब. लाल ने अपनी बाद की पुस्तकों में इन आलोचनाओं का जवाब दिया। विल डुरंत जैसे इतिहासकार ने तर्क दिया कि हिंसा के माध्यम से इस्लाम को फैलाया गया था।[83][84] सर जदुनाथ सरकार का कहना है कि कई मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में हिंदुओं के खिलाफ व्यवस्थित रूप से जिहाद छेड़ रहे थे, इस हद तक कि “काफ़िरों के परिवर्तन के लिए निर्दयतापूर्ण नरसंहार के सारे उपायों का सहारा लिया गया यहां तक कि भारतीय ब्राह्मण को जान से भी मार भी देते थे और प्रत्येक दिन लगभग 10 हजार लोग इस्लाम अपनाए नहीं तो जान से जाए ये फरमान भी किया गया था तथा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण होता था da”[85] वे हिंदू जो इस्लाम में धर्मान्तरित हुए थे, वे भी में ज़ियाउद्दीन अल-बरनी द्वारा स्थापित मुस्लिम जाति व्यवस्था के कारण अत्याचार से मुक्त नहीं थे,[86] जहां उन्हें “अज्लाफ़” जाति के रूप में माना जाता था और “अशरफ” जातियों द्वारा भेदभाव किया जाता था।[87]

“तलवार की नोक पर धर्मांतरण सिद्धांत” दक्षिण भारत, श्रीलंका, पश्चिमी बर्मा, बांग्लादेश, दक्षिणी थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया में व्याप्त विशाल मुस्लिम समुदाय की ओर इशारा करता है और भारतीय उप-महाद्वीप में ऐतिहासिक मुस्लिम साम्राज्य के गढ़ के आसपास बराबर संख्या में मुस्लिम समुदायों की कमी “तलवार की नोक पर धर्मांतरण सिद्धांत” का खंडन करती है। दक्षिण एशिया पर मुस्लिम विजय की विरासत पर आज भी गंभीर बहस जारी है। अर्थशास्त्र के इतिहासकार एंगस मेडीसन और जीन-नोएल बिराबेन ने विभिन्न जनसंख्या अनुमान किया और साथ ही संकेत मिलता है कि 1000 और 1500 के बीच भारत की जनसंख्या में कमी नहीं हुई, लेकिन उस समय के दौरान करीब 35 मिलियन बढ़ी थी।[88][89]

सभी मुस्लिम आक्रमणकारी हमलावर बस 1 या 2 को छोड़कर थे। बाद के शासकों ने राज्यों को जीतने के लिए लड़ाई लड़ी और नए राजवंशों की स्थापना के लिए वहां निवास किया। इन नए शासकों और उनके बाद के उत्तराधिकारियों (जिनमें से कुछ हिन्दू पत्नियों से जन्मे थे) की प्रथाओं में काफी विविधता थी। जबकि कुछ समान रूप से नफरत करते थे, अन्यों ने बाद में लोकप्रियता हासिल की। 14वी सदी में इब्न बतूता के वृतांत के अनुसार जिसने दिल्ली की यात्रा की थी, पिछले सुल्तानों में से एक विशेष रूप से क्रूर था और दिल्ली की आबादी उससे अत्यधिक नफरत करती थी, बतूता का वृतांत यह भी संकेत करता है कि अरब दुनिया, फारस और तुर्की के मुस्लिम अक्सर शाही सुझाव में समर्थन करते हुए कहते थे कि हो सकता है दिल्ली प्रशासन में वहां के स्थानीय लोगों ने कुछ हद तक एक अधीनस्थ भूमिका निभाई होगी। “तुर्क” शब्द का इस्तेमाल सामान्यतः उनकी उच्च सामाजिक स्थिति का उल्लेख करने के लिए किया जाता था। हालांकि एस.ए.ए. रिज़वी () ने इंगित किया कि मुहम्मद बिन तुगलक ने न केवल स्थानीय लोगों को प्रोत्साहित किया बल्कि कारीगर समूहों को भी उच्च प्रशासनिक पदों के लिए प्रोत्साहित किया जैसे बावर्ची, नाई और माली. उसके शासनकाल में, यह संभावना है कि इस्लाम में धर्मांतरण एक अधिक सामाजिक गतिशीलता और संशोधित सामाजिक सुधार के रूप में हुआ।[90]

1947 से पहले

भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष का एक जटिल इतिहास है, कहा जा सकता है 711 में सिंध में उमय्यद खलीफा के जिहाद के साथ यह संघर्ष शुरू हुआ। भारत में मध्ययुगीन काल में इस्लामी विस्तार के दौरान मंदिरों के विनाश के द्वारा हिंदू उत्पीड़न को देखा जा सकता है और मंदिके स्थान पर मस्जिद का निर्माण सोमनाथ[91][92] मंदिर के बार-बार विनाश करने और हिंदू प्रथाओं के विरोधी मुगल सम्राट और खिलजीवंशऔरंगजेब का अक्सर इतिहासकारों द्वारा उल्लेख किया गया है।[93]

1947 से 1991 तक

1947 में भारत विभाजन के बाद के परिणामों में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक संघर्षों और देश भर में रक्तपात को देखा गया। तब से, भारत में बड़े पैमाने पर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के वर्गों के बीच निहित तनाव से तेज हिंसा चली आ रही है। ये विवाद हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा बनाम इस्लामी चरमपंथ से भी उत्पन्न होते हैं और आबादी के विशेष तबके में प्रचलित हैं। आजादी के बाद से भारत ने धर्मनिरपेक्षता के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धता को हमेशा बनाए रखा है।

1992 के बाद से

विभाजन के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को बनाए रखने के बाद पिछले दशक में तनाव को उत्पन्न करने वाली अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने का मुद्दा है। इसे 1992 में विध्वंस किया गया था और कथित तौर पर हिंदू राष्ट्रवादी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के द्वारा यह कार्य किया गया था। इसके बाद जैसे को तैसा की तर्ज़ पर सारे देश में मुस्लिम और हिंदू कट्टरपंथियों के बीच हिंसा फ़ैल गई जिसमें शामिल थे मुंबई में मुंबई दंगे और साथ ही 1993 में मुंबई बम धमाका, इन वारदातों में कथित तौर पर माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम और मुख्य रूप से मुस्लिम डी-कंपनी आपराधिक गिरोह शामिल थे।

2001 में उग्रवादियों द्वारा भारतीय संसद पर एक हाई प्रोफ़ाइल हमले ने समुदाय के संबंधों में काफी तनाव पैदा कर दिया।

हाल ही में हुई सबसे हिंसक और शर्मनाक घटनाओं में से एक 2002 में घटित गुजरात दंगा था जिसमें अनुमानित तौर पर करीब एक हजार लोग मारे गए थे, मारे गए लोगों में ज्यादातर मुसलमान थे, कुछ सूत्रों ने करीब 2000 मुस्लिम हत्या का दावा किया है,[94] साथ ही इसमें राज्य सरकार की भागीदारी का भी आरोप लगाया गया है।[95][96] यह दंगा, गोधरा ट्रेन आगजनी के प्रतिशोध में किया गया था जिसमें बाबरी मस्जिद के विवादित स्थल से लौट रहे 50 हिन्दू तीर्थयात्रियों को गोधरा रेलवे स्टेशन की ट्रेन आगजनी में जिंदा जला दिया गया था। गुजरात पुलिस ने इस घटना के योजनाबद्ध होने का दावा किया और कहा कि इसे उग्रवादी मुसलमानों द्वारा हिंदू तीर्थयात्रियों के खिलाफ इस क्षेत्र में किया गया था। जांच के लिए बनर्जी आयोग को नियुक्त किया गया था जिसने इसे एक आग दुर्घटना होने की घोषणा की। [97] 2006 में उच्च न्यायालय ने इस समिति के गठन को अवैध घोषित किया क्योंकि न्यायमूर्ति नानावती शाह के नेतृत्व में एक अन्य कमेटी इस मुद्दे की जांच कर रही थी।[98] सितंबर 2008 के अंतिम सप्ताह में नानावती शाह आयोग ने पहले ही अपनी प्रथम रिपोर्ट पेश कर दी थी, जिसमें साफ कहा गया था कि गोधरा में ट्रेन आगजनी पूर्व-योजित थी और इसके लिए भारी मात्रा में पेट्रोल एक मुसलमान समूह द्वारा लाया गया था।[]

अहमदाबाद दंगों में शहर से उठता धुँआ

अहमदाबाद के क्षितिज धुएं से भरे हुए थे, क्योंकि इमारत और दुकानों में दंगों वाले भीड़ द्वारा आग लगाया गया था। दंगे जो गोधरा ट्रेन घटना के बाद शुरू हुए, जिसमें 790 से अधिक मुसलमानों और 254 हिंदुओं को मारा गया था, इसमें गोधरा ट्रेन की आग में मारे गए हिन्दू लोग भी शामिल हैं[99]

वहां बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा जारी थी, जिसमें मुस्लिम समुदायों को कष्ट भुगतना पड़ा. इन दंगों के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री, नरेंद्र मोदी और उनके कुछ मंत्रियों, पुलिस अधिकारी और अन्य दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की काफी आलोचना की गई। नरेंद्र मोदी के अंतर्गत गुजरात प्रशासन, गुजरात पुलिस ने जानबूझकर मुसलमानों को निशाना बनाया। यहां तक कि नरेंद्र मोदी पर नरसंहार का भी आरोप था लेकिन कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ।

मुसलमान-हिंदू विरोध को, SIMI (सिमी) (भारतीय इस्लामिक छात्र आंदोलन) जैसे कुछ इस्लामी संगठनों द्वारा और भी उत्तेजित किया गया जिसका उद्देश्य भारत में इस्लामिक शासन स्थापित करना है। पाकिस्तान आधारित कुछ अन्य समूह जैसे लश्कर-ए तैयबा और जैश-ए मोहम्मद हिंदू आबादी के खिलाफ स्थानीय मुस्लिमों को भड़काने का पक्षपात किया जाता है। इन समूहों को 11 जुलाई 2006 में मुंबई ट्रेन बम विस्फोट के लिए जिम्मेदार माना जाता है, जिसमें करीब 200 लोग मारे गए थे। ऐसे समूहों ने 2001 में भारतीय संसद पर भी हमला किया था और 1999 में भारतीय कश्मीर के कुछ भागों को पाकिस्तान का होने का दावा किया और गुप्त रूप से ऐसे कई हमले किए गए जिसमें भारतीय कश्मीर पर लगातार हमला और भारत की राजधानी नई दिल्ली पर बम धमाका शामिल है। इसी बीच, निर्दोष मुसलमान और हिन्दू, सांप्रदायिक संघर्ष की वेदी पर चढ़ते रहे और इस तरह की घटनाओं में लगातार वृद्धि होती जा रही है।[100]

प्रोफेसर एम.डी. नालापत (मनिपाल एडवांस्ड रिसर्च ग्रुप के उपाध्यक्ष, यूनेस्को पीस चेयर और मनिपाल विश्वविद्यालय के भू-राजनीति के प्रोफेसर) के अनुसार, “हिंदू – मुस्लिम” संघर्ष, “हिन्दू बैकलैश” या “आंशिक” धर्मनिरपेक्षता है, जिसमें केवल हिंदुओं के धर्मनिरपेक्ष होने की उम्मीद है जबकि मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को बहिष्करण प्रथा को चलाने के लिए स्वतंत्र हैं।[101]

2004 में, भारतीय स्कूल की कई पाठ्यपुस्तकों को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा रद्द कर दिया गया था क्योंकि उसमें उन्होंने मुसलमान विरोधी पूर्वाग्रह से भरा हुआ पाया था। एनसीईआरटी ने दलील दी कि यह किताबें “उन विद्वानों द्वारा लिखी गईं हैं जिन्हें पूर्व के हिंदू राष्ट्रवादी प्रशासन द्वारा चुना गया था”. के अनुसार, पाठ्यपुस्तकों में भारत में पूर्व हिन्दू मुस्लिम शासकों को “असभ्य आक्रमणकारी के रूप में और मध्ययुगीन अवधि को इस्लामी औपनिवेशिक साम्राज्य के रूप में दर्शाया गया था, जिसने भारत की हिन्दू साम्राज्य के गौरव अतीत को पहले समाप्त कर दिया था।”[102] एक पाठ्यपुस्तक में, यह अभिप्राय था कि ताज महल, कुतुब मीनार और लाल किला सभी इस्लामी वास्तुकला के उदाहरण थे- “जिसकी डिजाइन और कमीशन हिन्दुओं द्वारा किया गया था।”[102]

2010 में हुए देगंगा दंगे की शुरूआत 6 सितम्बर को हुई, जब एक इस्लामी गिरोह ने देगंगा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के तहत देगंगा, कार्तिकपुर और बलियाघाटा के हिन्दू स्थान पर आगज़नी और हिंसा की। यह हिंसा शाम को देर से शुरू हुई और रात भर चलती हुई अगली सुबह तक जारी रही। जिला पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और सीमा सुरक्षा बल सभी रिगोह हिंसा को रोकने में असफल रहे, अंततः इसे रोकने के लिए सेना को तैनात किया गया था।[103][104][105][106] सेना ने ताकि रोड पर एक फ्लैग मार्च का आयोजन किया, जबकि टाकी सड़क के भीतरी गांवों में बेरोकटोक इस्लामवादी हिंसा जारी रही, सेना की मौजूदगी और सीआरपीसी के धारा 144 तहत निषेधात्मक आदेश के बावजूद यह बुधवार तक जारी रही।

मुगल अवधि के दौरान पंजाब में सिख धर्म उभरा., मुगल सत्ता और सिखों के बीच संघर्ष 1606 में अपने आरम्भिक चरम पर पहुंचा जब सिखों के पांचवे गुरू गुरू अर्जन देव पर मुगल साम्राज्य के जहांगीर द्वारा अत्याचार किया गया और उनकी हत्या कर दी गई। पांचवें गुरु की हत्या कर देने के बाद उनके बेटे गुरु हर गोबिंद ने उनकी जगह ली जिन्होंने सिख धर्म को मूलतः योद्धा धर्म बनाया। गुरु जी पहले ऐसे योद्धा थे जिन्होंने मुगल साम्राज्य को एक युद्ध में परास्त किया जो कि वर्तमान में गुरदासपुर में हरगोबिंदपुर है[107] इस बिंदु के बाद सिख, अपनी सुरक्षा के लिए अपने आप को सैन्य बनाने के लिए मजबूर हुए. 16वीं सदी के बाद, 1665 में तेग बहादुर गुरु बने और 1675 तक सिखों का नेतृत्व किया। जब मुग़ल सम्राट द्वारा कश्मीरी पंडितों के इस्लाम न ग्रहण करने पर उन्हें मृत्यु दंड दिया जाने लगा तब कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधि ने तेग बहादुर से सहायता मांगी और हिन्दुओं की सहायता न करने के कारण औरंगजेब द्वारा ब्राह्मणो ने प्राण दंड दिलवा दिया गया। [108] हिन्दू-सिख संघर्ष और मुगल-सिख संघर्ष किस प्रकार आपस में जुड़े हैं उसका यह प्रारम्भिक उदाहरण है।

1699 में, खालसा की स्थापना सिखों के अंतिम गुरू गुरु गोबिंद सिंह द्वारा की गई। गोबिंद सिंह द्वारा एक पूर्व तपस्वी को उन लोगों को दंडित करने का कर्तव्य सौंपा गया जिन्होंने सिखों को कष्ट पहुंचाया., गुरु की मृत्यु के बाद बाबा बंदा सिंह बहादुर सिख सेना के नेता बन गए और मुगल साम्राज्य पर कई हमलों के लिए वे जिम्मेदार थे। इस्लाम ग्रहण कर लेने पर क्षमा दान की पेशकश को ठुकरा देने के बाद जहांदार शाह द्वारा उन्हें मृत्यु दंड दिया गया। [109] 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान मुगल सत्ता का ह्रास होने लगा और उसी दौरान सिख महासंघ और बाद में सिख साम्राज्य की ताकत बढ़ने लगी, जिसके परिणामस्वरूप संतुलित शक्ति का निर्माण हुआ जिसने सिखों को अधिक हिंसा से रक्षा की। 1849 के आंग्ल-सिख द्वितीय युद्ध के बाद सिख साम्राज्य को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में समाहित कर लिया गया।

1947 में भारत विभाजन के दौरान विशाल जनसंख्या का आदान-प्रदान हुआ और पंजाब का ब्रिटिश भारतीय प्रांत दो भागों में विभाजित हुआ और पश्चिमी भागों को पाकिस्तान के डोमिनियन को दिया गया, जबकि पूर्वी भागों यूनियन ऑफ इंडिया को दिया गया।
5.3 मिलियन मुसलमान भारत से पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब में चले गए, 3.4 मिलियन हिंदू और सिख पाकिस्तान से भारत के पूर्वी पंजाब में स्थानांतरित हुए., इतने बड़े पैमाने पर प्रवास और दोनों सीमाओं में होने वाले भीषण हिंसा और हत्या को रोकने में नवगठित सरकारें पूरी तरह से असमर्थ थीं। मोटे तौर पर मौतों की संख्या लगभग 500,000 थीं और मौतों की अनुमानित संख्या कम से कम 200,000 और अधिक से अधिक 1,000,000 थी।
पंजाब के अधिकतर सिख अपने आप के इस्लाम धर्म का हिस्सा मानते है, इसी कारण कोई प्रतिकुल प्रभाव नही पड़ा।न[110]

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जमालाबाद किला मार्ग. मंगलोरियन कैथोलिक इस मार्ग के माध्यम से अपने सेरिंगपटम के लिए इस रास्ते पर यात्रा की थी

बाकुर पांडुलिपि ने उनके बारे में कहा है:
[111]
1784 में मंगलौर की संधि के बाद जल्द ही टीपू ने केनरा पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया।[112] उन्होंने केनरा में ईसाइयों की सम्पदा को जब्त कर लेने का फरमान जारी किया,[113] और जमालाबाद किला के माध्यम से अपने साम्राज्य की राजधानी श्रीरन्गापटनम उन्हें निर्वासित किया।[114] हालांकि, उनमें बंदियों में से कोई भी पादरी नहीं था। मिरांडा फादर के साथ मिलकर, सभी गिरफ्तार 21 पादरियों को गोवा में भेजने का आदेश दिया गया, 2 लाख का जुर्माना किया गया और साथ अगर वे कभी लौट कर आएंगे तो फांसी के माध्यम मौत के घाट उतारने की धमकी दी गई।[111]

टीपू ने 27 कैथोलिक चर्चों को नष्ट करने का आदेश दिया, सभी चर्चों में विभिन्न संतों की खूबसूरत नक़्क़ाशीदार प्रतिमाएं थीं। उनमें मंगलौर का नोसा सेनहोरा डी रोजरियो मिलाग्रेस का चर्च, मोन्टे मेरिएनो का एफआर मिरांडा सेमीनरी, ओमज़ूर का जेसु मरिए जोसे चर्च, बोलार का चापेल, उल्लाल का चर्च ऑफ मर्सिस, मुल्की का इमाकुलाटा कॉनसिएसियाओ, पेरार का सन जोसे, किरेम का नोसा सेनहोरा डोस रेमेडिएस, कर्काल का साव लॉरेंस, बार्कुर का रोजारिओ, बैडनुर का इमाकुलाटा कॉन्सेसियाओ शामिल था।[111] अपवाद के रूप में होसपेट के द चर्च ऑफ पॉली क्रॉस को छोड़कर सभी को नष्ट कर दिया गया, इसे मूद्बिदरी के चौता राजा के लिए अनुकूल कार्यालयों के लिए छोड़ दिया था।[115]

एक स्कॉटिश सैनिक और केनरा के पहले कलेक्टर थोमस मुनरो के अनुसार, उनमें से करीब 60,000[116] यानी सम्पूर्ण मंगलौरियन कैथोलिक समुदाय का लगभग 92 प्रतिशत को कैद कर लिया गया, केवल 7000 ही बच पाए. फ्रांसिस बुकानन के अनुसार 80,000 की आबादी में से 70,000 को कैद किया गया और केवल 10000 ही बच पाए. पश्चमी घाट के पर्वतों पर जंगलों से होते हुए वे लगभग 4,000 फीट (1,200 मी॰) चढ़ाई करने के लिए मजबूर थे। यह मंगलौर से श्रीरन्गापटनम के लिए 210 मील (340 कि॰मी॰) था और यात्रा में छह हफ्ते लगे। ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड के मुताबिक, श्रीरन्गापटनम मार्च के दौरान उनमें से 20,000 का निधन हो गया। एक ब्रिटिश अधिकारी जेम्स स्करी जो मंगलोरियन कैथोलिक के साथ बंदियों के साथ था, के अनुसार उनमें से 30000 को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया। युवा महिलाओं और लड़कियों को वहां रहने वाले मुसलमानों की जबरन पत्नी बनाया गया।[117] वे युवा पुरुष जिन्होंने प्रतिरोध किया उनके नाक, ऊपरी होंठ और कान को काट कर विकृत कर दिया गया।[118]

1800 में गोवा के आर्कबिशप ने लिखा कि, “[111]

ब्रिटिश अधिकारी जेम्स स्करी, जिसे टीपू सुल्तान द्वारा मंगलोरियन कैथोलिक के साथ 10 साल तक हिरासत में रखा गया

टीपू सुल्तान की मालाबार पर आक्रमण से मालाबार तट पर सीरिया के मालाबार नसरानी समुदाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और उन लोगो मे से अधिकतर लोगो ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना लिया,. कोचीन और मालाबार के कई चर्च क्षतिग्रस्त हो गए थे। अंगमाली में पुराने सीरियाई नसरानी चर्च जो कई शताब्दियों के लिए कैथोलिक धार्मिक शिक्षा का केंद्र थे, टीपू के सैनिकों द्वारा नष्ट कर दिए गए। सदियों पुरानी धार्मिक पांडुलिपि हमेशा के लिए खो गई। बाद में चर्च को कोट्टायम में स्थानांतरण किया गया जो कि अभी भी मौजूद है। अकपराम्बू में स्थित मोर सबोर चर्च और मदरसा से जुड़े मार्था मरियम चर्च को भी नष्ट कर दिया गया। 1790 में टीपू की सेना ने पलायूर की चर्च में आग लगा दी और ओल्लुर चर्च पर हमला किया। इसके अलावा, अर्थत चर्च और अम्बज्हक्कड़ चर्च को भी नष्ट कर दिया गया था। इस आक्रमण के दौरान, कई सीरियाई मालाबार नसरानी मारे गए या स्वेच्छा से इस्लाम धर्म में परिवर्तित किए गए। सीरिया मालाबार किसानों द्वारा लगाए गए अधिकांश नारियल, सुपारी, काली मिर्च और काजू वृक्षारोपण को भी सेना द्वारा अंधाधुंध नष्ट कर दिया गया। परिणामस्वरूप, जब टीपू की सेनाओं ने गुरूवायूर और आसन्न क्षेत्रों पर आक्रमण किया, सीरियाई ईसाई समुदाय केलिकट और छोटे शहरों से नए स्थानों जैसे कुन्नम्कुलम, चलाकुडी, एन्नाकदु, चेप्पदु, कन्नंकोड़े, मवेलिक्कारा आदि में भाग गए जहां ईसाई समाज के लोग रहते थे। उन्हें कोचिन और कार्थिका थिरूनल के शासक, सक्थान तम्बुरन ने शरण दी और त्रावणकोर के शासक जिन्होंने उन्हें भूमि दी, वृक्षारोपण और उनके व्यापार को प्रोत्साहित किया। त्रावणकोर के ब्रिटिश निवासी कर्नल मक्कुलय ने भी उन्हें मदद की., और धीरे धीरे नसरानी इसाई ब्रिटिशो की इस्ट इंडिया कम्पनी का खुलकर समर्थन करने लगे इसी। [119]

उसका उत्पीड़न पकड़े गए ब्रिटिश सैनिकों पर भी जारी रहा., उदाहरण के लिए, 1780 से 1784 के बीच ब्रिटिश बंधकों के जबरन धर्म परिवर्तन की संख्या अधिक थी। पोल्लिलुर की लड़ाई में उनके विनाशकारी हार के बाद अनगिनत संख्या में महिलाओं के साथ 7,000 ब्रिटिश पुरुषों को टीपू के द्वारा श्रीरन्गापटनम के किले में बंदी बनाया गया। इनमें से, 300 से अधिक लोगों का खतना किया गया और मुस्लिम नाम और कपड़े दिए गए और कई ब्रिटिश रेजिमेंट ढंढोरची लड़को को दरबारी लोगों के मनोरंजन के लिए या नाचने वाली के रूप में पहनने पर मजबूर किया गया। 10 साल की लंबी अवधि की कैद के बाद उन कैदियों में एक जेम्स स्करी भी था, उसने बताया कि कुर्सी पर बैठना और चाकू और कांटा का इस्तेमाल करना भी वह भूल गया था। उसकी अंग्रेजी खराब हो गई थी और अपने सभी स्थानीय भाषा मुहावरा को भूल चुका था। उसकी त्वचा अश्वेत की तरह सांवले रंग की हो गई थी और इसके अलावा यूरोपीय कपड़ों से उसे नफरत हो गई थी।[120] मंगलौर किले के आत्मसमर्पण के दौरान जब ब्रिटिश द्वारा युद्धविराम हुआ था और बाद में उनके वापसी के दौरान सभी मेस्टीज़ोस थे और 5,600 मंगलौरियन कैथोलिक के साथ बाकी सभी गैर ब्रिटिश विदेशी एक साथ मारे गए थे। टीपू सुल्तान द्वारा विश्वासघात के लिए दोषी ठहराय गए लोगों को फौरन फांसी पर लटका दिया गया, फांसी का चौखट लाशों की संख्या से लटक जाता था। मृत शरीर के कारण नेत्रावती नदी इतनी बदबूदार हो गई थी कि नदी के किनारे रहने वाले स्थानीय लोग वहां से जाने के लिए मजबूर हो गए।[111]

1989 में लेह जिले के मुसलमानों का बौद्धों द्वारा एक सामाजिक बहिष्कार किया गया। बहिष्कार 1992 तक चलता रहा। लेह में बहिष्कार के समाप्त होने के बाद मुसलमानों और बौद्धों के बीच संबंधों में काफी सुधार हुआ, हालांकि शक अभी भी बना हुआ है।
2000 के दशक में करगिल के गांव में कुरान को अपवित्र करने और बाद में लेह और करगिल शहर में मुसलमानों और बौद्ध समूहों के बीच हुआ संघर्ष, लद्दाख में दोनों समुदायों के बीच गहरे तनाव का संकेत करता है।[121]

दक्षिण एशियाई मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण की इकाइयों को सन्दर्भित करता है जो कि दक्षिण एशिया में मुसलमानों के बीच में विकसित हुआ है।

सूत्रों से संकेत मिलता है कि मुसलमानों के बीच जाति का विकास काफ़ा (Kafa’a) की अवधारणा के परिणामस्वरूप हुआ।
मध्यकाल मे एक बड़ी संख्या मे स्वर्ण हिन्दुओ ने इस्लाम धर्म अपनाया और इस तरह भारत के मुसलमानों मे भी जाति आ गई। [122][123][124] जिन लोगों को अशरफ्स (शरीफ को भी देंखे) के रूप में सन्दर्भित किया जाता है, उन्हें ऊंचे स्तर का माना जाता था, और उन्हें विदेशी अरब वंश का माना जाता है।
[125][126], जबकि अज्लाफ्स को हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाला मुसलमान माना जाता है और उन्हें निचली जाति का माना जाता है।
भारत सहित, वास्तविक मुस्लिम सामाजिक व्यवहार, कठोर सामाजिक ढांचे के अस्तित्व की ओर इशारा करता है जिसे कई मुस्लिम विद्वानों ने काफ़ा की धारणा के साथ सम्बंधित फिक के विस्तृत नियम के माध्यम से उचित इस्लामी मंजूरी प्रदान करने की कोशिश की।

प्रमुख मुस्लिम विद्वान मौलवी अहमद रजा खान बेरलवी और मौलवी अशरफ अली फारूकी थान्वी जन्म पर आधारित श्रेष्ठ जाति की अवधारणा के ज्ञाता हैं। यह तर्क दिया जाता है कि अरब मूल (सैयद और शेख) के मुस्लिम गैर-अरब या अजामी मुस्लिम से श्रेष्ठ जाति के होते हैं और इसलिए जब कोई आदमी अरब मूल का होने का दावा करता है तो वह अजामी महिला से निकाह कर सकता है जबकि इसके विपरीत संभव नहीं है। इसी तरह का तर्क है, एक मनिहार मुस्लिम, आदमी एक जुलाहा (अंसारी) ,मंसूरी (धुनिया), रईन (कुंजरा) या कुरैशी (कसाई या बूचड़) महिलाओं से निकाह कर सकता है लेकिन अंसारी, रईन, मंसूरी और कुरैशी आदमी मनिहार महिला से निकाह नहीं कर सकता है, चूंकि ऐसा माना जाता है कि मनिहार के मुकाबले ये जातियां निचली हैं। इनमें से कई उलामा यह भी मानते हैं कि अपनी जाति के भीतर ही निकाह सबसे अच्छा होता है। भारत में सजातीय विवाह का कठोरता से पालन किया जाता है, परंतु अब आधुनिक सल़फी इस्लाम धर्म मे किसी भी प्रकार के जाति व्यवस्था का पालन नही किया जाता है।
अधिकतर सल़फी उलामा का कहना है, जो लोग जाति व्यवस्था मानते हैं, वो काफिर है। [127][128] सबसे दिलचस्प बात यह है कि तीन आनुवंशिक अध्ययन, जिसमें दक्षिण एशियाई मुसलमानों का प्रतिनिधित्व है, यह पाया गया कि मुस्लिम आबादी ज़बर्दस्त ढंग से बढ़ रही है जिसमें स्थानीय गैर-मुस्लिम में कुछ पहचान प्राप्त विदेशी आबादी भी शामिल है, मुख्य रूप से वे अरबियन पेनिनसुला के बजाए ईरान और मध्य एशिया से हैं।[21]

दक्षिण एशिया के कुछ भागों में मुसलमान, अश्रफ्स और अज्लाफ्स के रूप में विभाजित हैं।[129] अश्रफ्स, विदेशी वंश से उत्पन्न अपनी ऊंची जाति का दावा करते हैं।[125][130] हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाले को गैर-अश्रफ्स माना जाता है और इसलिए वे स्वदेशी आबादी होते हैं। वे, वैकल्पिक रूप से कई व्यावसायिक जातियों में विभाजित हो जाते हैं।[130]

उलेमा की धारा (इस्लामी न्यायशास्त्र के विद्वानों) काफ़ा की अवधारणा की मदद से धार्मिक जाति वैधता प्रदान करते हैं।[131] मुस्लिम जाति व्यवस्था के विद्वानों की घोषणा का एक शास्त्रीय उदाहरण है, जिसे तुर्की विद्वानों जियाउद्दीन बरानी द्वारा चौदहवीं शताब्दी में लिखा गया था, जो कि दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के मुहम्मद बिन तुगलक दरबार के एक सदस्य थे। बरनी को उसके कठोरता पूर्वक जातिवादी विचारों के लिए जाना जाता था और अज्लाफ़ मुसलमानों से अशरफ मुसलमानों को नस्ली रूप से ऊंचा माना जाता है। उन्होंने मुसलमानों को ग्रेड और उप श्रेणियों में विभाजित किया। उनकी योजना में, सभी उच्च पद और विशेषाधिकार, भारतीय मुसलमानों की बजाए तुर्क में जन्म लेने वाले का एकाधिकार हैं। यहां तक कि उनकी कुरान की अपनी व्याख्या “वास्तव में, आप लोगों के बीच सबसे पवित्र अल्लाह हैं” उन्होंने महान जन्म के साथ धर्मनिष्ठता का जुड़े होने को मानते हैं। बर्रानी अपने सिफारिश पर सटीक थे अर्थात “मोहम्मद के बेटे” [यानी अशरफ] ” को [यानी अजलफ] की तुलना में एक उच्च सामाजिक स्थिति दिया.[132] फतवा में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान इस्लाम के लिए सम्मान के साथ जातियों का उनका विश्लेषण था।[132] उनका दावा था कि जातियों को राज्य कानून या “ज़वाबी” के माध्यम से अनिवार्य किया जाएगा और जब कभी वे संघर्ष में थे शरीयत कानून पर पूर्ववर्तिता को लाया जाएगा.[132] फतवा-ई जहांदारी (सलाह XXI) में उन्होंने “उच्च जन्म के गुण” के बारे में “धार्मिक” और “न्यून जन्म” के रूप में “दोष के संरक्षक” लिखा था। हर कार्य जो “दरिद्रता से दूषित और अपयश पर आधारित] नज़ाकत से [अज्लाफ़ से] आता है”.[132] बरानी के पास अज्लाफ़ के लिए एक स्पष्ट तिरस्कार था और दृढ़ता से उन्होंने उनके शिक्षा से वंचित करने की सिफारिश की है, क्योंकि ऐसा न हो कि वे अशरफ की स्वामित्व को हड़प लें. उन्होंने प्रभाव मंजूरी के लिए धार्मिक मांग को उचित माना है।[124] साथ ही बर्रानी ने जाति के आधार पर शाही अधिकारी (“वजीर”) की पदोन्नति और पदावनति की एक विस्तृत प्रणाली को विकसित किया।[132]

अशरफ/अजलफ के विभाजन के अलावा, मुसलमानों में एक जाति भी होती है,[133] जिन्हें बाबासाहेब अम्बेडकर की तरह जाति-विरोधी कार्यकर्ता के रूप में माना जाता है जो कि एक अछूत की तरह हैं।[134][135] “अरज़ल” शब्द का संबंध “अपमान” से होता है और अरज़ल जाति को भनर, हलालखोर, हिजरा, कस्बी, ललबेगी, मौग्टा, मेहतर आदि में प्रतिभाग किया जाता है।[134][135][136] अरज़ल समूह को 1901 की भारत की जनगणना में दर्ज किया गया था और इन्हें दलित मुस्लिम भी कहा जाता है।[137] “इनके साथ और मुहम्मद साहब नहीं जुड़ते और इन्हें भी मस्जिद में प्रवेश करने और सार्वजनिक कब्रिस्तान का इस्तेमाल करने से वर्जित नही किया जाता है।”उन्हें सफाई करना और मैला ले जाना जैसे “छोटे” व्यवसायों के लिए दूर किया जाता है।
क्योंकी स्वयं पैगम्बर मुहम्मद साहब का कथन है,,
“न अरब अजमी(गैर अरब) से बड़ा है”
“न अजमी(गैर अरब) अरब से”
“जो कुछ भी है तकवा और परहेजगारी से है”
““इस्लाम धर्म मे सब बराबर है, चाहे वो गोरा होया काला,अमीर हो या गरीब,ऊँची जाति का हो या नीची जाति का””
[138]

कुछ दक्षिण एशियाई मुसलमानों को के अनुसार उनके समाजिक स्तरीकरण के लिए जाना गया है।[139] ये मुसलमान, सामाजिक स्तरीकरण की एक रस्म आधारित प्रणाली को मानते हैं। कुओम्स, जो मानव उत्सर्जन के साथ समझौता करता है उसे निम्नतम स्तर दिया जाता है। भारत में बंगाली मुसलमानों के अध्ययन से संकेत मिलता है कि शुद्धता और अशुद्धता की अवधारणा उन के बीच ही मौजूद हैं और अंतर – समूह के रिश्तों में लागू होता है, चूंकि एक व्यक्ति में स्वच्छता और सफाई का विचार व्यक्ति की सामाजिक स्थिति पर निर्भर होती है, न कि उसकी आर्थिक स्थिति पर.[130] भारतीय मुसलमानों में मुस्लिम राजपूत भी एक जाति है।

मुस्लिम समुदाय के कुछ पिछड़े या निम्न जाति में शामिल अंसारी, कुंजर, धोबी, चमार और हलालखोर शामिल हैं। उच्च और मध्यम जाति के मुस्लिम समुदायों में सैयद, शेख,मनिहार, राजपुत, खानजादा, पठान, काय़मखानी, मुगल, चौहान और मलिक शामिल हैं।[140] आनुवंशिक डेटा भी इस स्तरीकरण समर्थन करता है।[141] इसे ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में अरबी वंश के लिए अधिकांश दावे त्रुटिपूर्ण हैं और स्थानीय शरीयत में अरबी प्राथमिकताओं की ओर इशारा करते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि तीन आनुवंशिक अध्ययनों में जिसमें दक्षिण एशियाई मुसलमानों का प्रतिनिधित्व है, यह पाया गया कि मुस्लिम आबादी ज़बर्दस्त ढंग से बढ़ रही है जिसमें स्थानीय गैर-मुस्लिम में कुछ पहचान प्राप्त विदेशी आबादी भी शामिल है, मुख्य रूप से वे अरबियन पेनिनसुला के बजाए ईरान और मध्य एशिया से हैं और आज भी हिन्दु धर्म की एक बड़ी संख्या इस्लाम धर्म अपनाती जा रही है।[21]

सच्चर समिति की रिपोर्ट भारत सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त है और 2006 में जारी हुई थी, समाज स्तरीकरण में मुस्लिम दस्तावेज जारी हैं।

और के बीच संपर्क, स्थापित जजमानी प्रणाली के संरक्षक-ग्राहक संबंधों द्वारा विनियमित है, ऊंची जातियों को ‘जजमान’ के रूप में सन्दर्भित किया जाता है और निम्न जातियों को ‘कमिन’ कहा जाता है। निम्न जाति के मुसलमानों के साथ संपर्क में आने से ऊंची का मुसलमान लघु स्नान करके अपने को शुद्ध कर सकता है, क्योंकि शुद्धीकरण के लिए कोई विस्तृत विधि नहीं है।[130] भारत के बिहार राज्य में ऐसे मामलों की सूचना दी गई है जिसमें उच्च जाति का मुसलमान, कब्रिस्तान में निम्न जाति के मुसलमानों की अंत्येष्टि का विरोध करता है।[140]

कुछ आंकड़े इंगित करते है कि हिंदुओं की तरह मुसलमानों के बीच जाति भेद कठोर नहीं है।[142][142] बंगलादेश में एक पुरानी कहावत है: पिछले साल मैं एक जुलाहा था; इस साल एक शेख हूं; और अगले साल यदि फसल ठीक रही तो मैं एक सैय्यद होऊंगा। “[143] हालांकि, अम्बेडकर जैसे अन्य विद्वान इस उक्ति से असहमत थे (नीचे आलोचना को देंखे)
प्रसिद्ध सूफी, सैयद जलालुद्दीन बुखारी जिन्हें मखदूम जहानियां-ए-जहान्गाष्ट के रूप में जाना जाता है, ने घोषणा की है कुरान से अधिक ज्ञान प्रदान करना और प्रार्थना और उपवास के नियम तथाकथित राजिल (अज़लफ्स) जाति के लिए सूअर और कुत्ते के सामने मोती बिखरने की तरह है! उन्होंने कथित तौर पर जोर देकर कहा कि दूसरे मुसलमानों को शराब और सूदखोर के उपभोक्ता के अलावा नाइयों, लाशों को साफ करने वाले, रंगरेज, चर्मकार, मोची, धनुष निर्माताओं और धोबी के साथ खाना नहीं चाहिए.
मोहम्मद अशरफ अपने ‘हिंदुस्तानी माशरा अहद-ए-उस्ता में” लिखते हैं कि कई मध्ययुगीन इस्लामी शासक निम्न वर्ग के लोगों को अपने दरबारों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते थे, या अगर कोई प्रवेश कर भी जाता था तो उन्हें मुंह खोलने से मना किया जाता था क्योंकि उसे वे ‘अशुद्ध’ मानते थे।[127]
विद्वान शब्बीर अहमद हकीम ने थानवी द्वारा लिखित पुस्तक “मसावात-ए- बहार-ए शरीयत” से उद्धृत करते हैं, जिसमें थनवी तर्क देते हैं कि ‘जुलाहों’ (बुनकर) और ‘नाई’ (नाई) को मुसलमानों के घरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देना चाहिए। अपने “बहिश्ती जेवर” में थानवी ने दावा किया है कि एक सैयद पिता और एक गैर सैयद मां के बेटे सामाजिक दृष्टि से एक सैयद जोड़ी के बच्चों से हीन होता है।

अपने “इमदाद उल-फतवा में, थानवी ने घोषणा की कि सय्यैद, शेख़, मुगल और पठान सभी ‘सम्मानित'(शरीफ) समुदाय हैं और कहा कि तेल-निचोड़ने वाला (तेली) और बुनकर (जुलाहा) समुदाय ‘निम्न’ जातियां हैं (राजिल अक्वाम). उन्होंने कहा कि गैर-अरब, इस्लाम में परिवर्तित करने वाले ‘नव-मुसलमान’ को स्थापित मुसलमान (खानदानी मुसलमान) के साथ कफा, निकाह प्रयोजन के रूप में विचार नहीं किया जा सकता है। तदनुसार उन्होंने तर्क दिया कि पठान गैर-अरब हैं और इसलिए ‘नव मुसलमान’ हैं और सैय्यद और शैख़ कफा नहीं हैं, जो अरब वंश का दावा करते हैं, इसलिए उनके साथ अंतर्विवाह नहीं कर सकते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पहले अध्यक्ष और देवबंद मदरसे के कुलपति मौलवी कारी मोहम्मद तय्येब सिद्दीकी के कुलपति भी जातिवाद के समर्थक थे और मुफ्ती उस्मानी की किताब के समर्थन में दो पुस्तकें लिखीं: “अन्सब वा काबिल का तफाजुल” और “नस्ब और इस्लाम”. जाती को वैध ठहराने की इस परम्परा के अनुसार, आज भी देखा जा सकता है कि आज भी देवबंद मदरसे के प्रवेश फार्म में एक स्तंभ है जिसमें आवेदकों से उनके जाति का नाम लिखने के लिए पूछा जाता है। इसके स्थापित होने के कई साल बाद, गैर-अशरफ छात्र आम तौर पर देवबंद में भर्ती नहीं होते थे और यह व्यवहार अभी भी जारी है।

कुछ मुस्लिम विद्वानों ने कहा है कि भारतीय मुस्लिम समाज में जिस प्रकार की जाति विशेषता है वह “कुरान की विश्वदृष्टि का खुला उल्लंघन है।”. हालांकि, ज्यादातर मुस्लिम विद्वान इसका एक अलग तरीके से अनुमान लगाने और जातिवाद के औचित्य के लिए कुरान औऱ शरीयत की व्याख्या के माध्यम से “कुरान समतावाद और भारतीय मुस्लिम सामाजिक प्रथा” में सामंजस्य स्थापित करने और पुनः ठीक करने की कोशिश करते हैं।[144]

हालांकि कुछ विद्वानों का सिद्धांत है कि हिन्दुओं जातियों की तरह मुस्लिम जातियों में भेदभाव नहीं है,[124][142] डॉ॰ अम्बेडकर ने इसके समर्थन मे अपना तर्क देते हुए लिखा कि मुस्लिम समाज में जिस प्रकार सामाजिक बुराइयां थीं वह “हिन्दू समाज से कम ही थीं” .[134][135]

बाबासाहेब अम्बेडकर भारतीय राजनीति के विख्यात व्यक्ति थे और भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार हैं। वे मुस्लिम जाति व्यवस्था और उनके अभ्यासों के कटु आलोचक थे, उन्होंने उद्धृत किया कि “इन समूहों के जाति के भीतर एकदम हिन्दुओं की ही तरह सामाजिक वरीयता होती है लेकिन कई मायनों में वे हिन्दू जातियों से भी बदतर होती हैं।”. अशरफ को कैसे अज़लफ और अगज़ल को “बेकार” माना जाता है के वे कटु आलोचक हैं और वह तथ्य जिसे मुसलमान “भाईचारे” के माध्यम से कठोर बात को कोमल रीति से कहते हुए सांप्रदायिक विभाजन का वर्णन करने की कोशिश करते हैं। साथ ही उन्होंने भारतीय मुसलमानों के बीच शास्त्रों के शाब्दिक अर्थ को अपनाने के लिए भी आलोचना की जो कि मुसलमानों में मुस्लिम जाति व्यवस्था के कठोरता और भेदभाव की ओर अग्रसर हुई। उन्होंने मुस्लिम जातिवाद के लिए शरीयत के अनुमोदन की निंदा की। यह समाज में विदेशी तत्वों की श्रेष्ठता पर आधारित था जिसने अंततः स्थानीय दलितों के पतन का नेतृत्व किया। यह त्रासदी हिंदुओं की तुलना में अधिक कठोर थी जो कि जातीय आधार पर दलितों के समर्थन से संबंधित है। 1300 में भारत में इस्लामी उपस्थिति के दौरान भारतीय मुसलमानों में अरब महत्ता को उच्च और निम्न जाति के हिंदुओं द्वारा बराबर अस्वीकृति की जाती थी। जिस प्रकार दूसरे देशों के मुसलमानों जैसे बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में तुर्कियों ने अपना सुधार किया इसी प्रकार से भारत में मुस्लिम समुदायों के सुधार करने में असमर्थता का उन्होंने निंदा की। [134][135]

पाकिस्तानी-अमेरिकी समाजशास्त्री आयशा जलाल अपनी पुस्तक “डेमोक्रेसी एंड ऑथोरिटेरिएनिज्म इन साउथ एशिया” (दक्षिण एशिया में लोकतंत्र और निरंकुशवाद) में लिखती हैं कि “समतावादी सिद्धांतों के बावजूद, दक्षिण एशिया में इस्लाम ऐतिहासिक रूप से वर्ग और जाति असमानताओं के प्रभाव से बचने में असमर्थ रहा है। हिंदू धर्म के मामले में, ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के पदानुक्रमित सिद्धांतों में हमेशा से ही हिंदू समाज के भीतर विवाद रहा है, जिससे यह सुझाव मिलता है कि हिन्दू धर्म में आज भी समानता को महत्व दिया जाता है।”[145]

भारत में कई मुस्लिम संस्थान स्थापित हैं। यहां मुसलमानों द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित संस्थानों की सूची दी जा रही है।

  • आधुनिक विश्वविद्यालय और संस्थान:
  • पारंपरिक इस्लामी विश्वविद्यालय:

2001 की जनगणना के अनुसार भारतीय राज्यों में मुस्लिम आबादी.[146]

जनसंख्या का प्रतिशत वितरण (समायोजित)
धार्मिक समुदायों द्वारा: भारत – 1961 से 2001
जनगणना (असम और जम्मू कश्मीर को छोड़कर).[9]

वर्ष

प्रतिशत

1951

10.1%

1971

10.4%

1981

11.9%

1991

12.0%

2001

12.8%

भारत के धार्मिक समुदाय द्वारा जनसंख्या का प्रतिशत वितरण (असमायोजित) – 1961-2001 की जनगणना (असम और जम्मू व कश्मीर को छोड़े बिना).[9]

वर्ष

प्रतिशत

1961

10.7%

1971

11.2

1981

12.0%

1991

12.8%

2001

13.4%

[α] [β]

संरचना

हिंदू[147]
मुस्लिम[148]

2001 जनसंख्या का कुल %

80.5

13.4

10 वर्ष वृद्धि % (’91-01′)[32] [β]

20.3

36.0

लिंग अनुपात (* औसत. 933)

931

936

साक्षरता दर (औसत. 64.8)

65.1

59.1

सीमांत श्रमिक

40.4

31.3

ग्रामीण लिंग अनुपात[32]

944

953

शहरी लिंग अनुपात[32]

894

907

बच्चे के लिंग अनुपात (0-6 वर्ष)

925

950

सूफीवाद, इस्लाम का एक रहस्यमय आयाम है, जो अक्सर शरीयत के विधि सम्मत मार्ग के साथ पूरक रहा है, उसका भारत में इस्लाम की वृद्धि पर गहरा प्रभाव पड़ा. अक्सर रूढ़िवादी व्यवहार के मुहानों पर एक सूफी भगवान के साथ सीधे एकात्मक दृष्टि को प्राप्त करते हैं और इसके बाद एक पीर (जीवित संत) बन सकते हैं जो कि शिष्यता (मुरिद) को ग्रहण कर सकते हैं और आध्यात्मिक वंशावली को स्थापित करते हैं जो कि कई पीढ़ियों तक चल सकता है। मोइनुद्दीन चिश्ती (1142-1236) के शासन के बाद जो कि अजमेर, राजस्थान में बसे थे, तेरहवीं शताब्दी के दौरान सूफियों का पंथ भारत में महत्वपूर्ण हो गया और उन्होंने अपनी पवित्रता के चलते इस्लाम में धर्मान्तरित करने के लिए महत्वपूर्ण संख्याओं में लोगों को आकर्षित किया। उनकी चिश्तिया पंथ भारत में सबसे प्रभावशाली सूफी वंश बन गया, हालांकि मध्य एशिया और दक्षिण पश्चिम एशिया के अन्य क्रम भी भारत में पहंची और इस्माम के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाई. इस तरह, उन्होंने क्षेत्रीय भाषा में तमाम साहित्य का सृजन किया जिसमें प्राचीन दक्षिण एशियाई परंपराओं में गहनतम इस्लामी संस्कृति को सन्निहित किया गया।

मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने भारतीय इस्लाम के विकास में विभिन्न दिशाओं को खंगाला और बीसवीं शताब्दी के दौरान मुस्लिम समुदाय से कई राष्ट्रीय आंदोलन उभरे. सबसे रूढ़िवादी शाखा की निर्भरता, पूरे देश भर में सैकड़ों धर्म प्रशिक्षण संस्थानों (मदरसा) द्वारा दी जाने वाली शिक्षा प्रणाली पर है जो अरबी और फारसी भाषा में कुरान और इस्लामिक पुस्तकों के अध्ययन के अलावा कुछ और नहीं सिखाते हैं।

2005-2006 के मध्य में अनुमानित 15 करोड़ के दो-तिहाई भारतीय मुस्लिम आबादी रहस्यवाद सुन्नी बरेलवी विचारधारा और दरगाह भ्रमण, संगीत और योग विद्या जैसे सूफी परम्परा के अनुयायी माने जाते हैं।[149] मंज़र-ए-इस्लाम बरेली और अल जमियातुल अशरफिया, बरेलवी मुसलमानों का सबसे प्रसिद्ध सेमिनरी है। 2005-2006 के दौरान मुस्लिम समुदाय के पर्याप्त अल्पसंख्यकों का भारतीय शिया मुसलमान एक रूप है जो कि उस समय के 157 मिलियन की कुल मुस्लिम आबादी का अनुमानित 25%-31% है। टाइम्स ऑफ इंडिया और डीएनए जैसे सूत्रों ने बताया कि उस समय के दौरान भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी 157,000,000 का 40,000,000[150][150] से 50,000,000[151] की आबादी शिया मुसलमानों की थी[152][153]

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में प्रभावशाली धार्मिक मदरसा दारुल उलूम देवबंद (ज्ञान का निवास/घर) से उत्पन्न भारत के हनाफी विचारधारा के बाद मुस्लिम आबादी का एक और प्रभावशाली भाग देवबंद है। इस मदरसे को अपने राष्ट्रवादी उन्मुखीकरण के लिए जाना जाता है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.1919 में देवबंदी विद्वानों द्वारा स्थापित जमीयत-उल-उलेमा-ए हिंद ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपना समर्थन दिया और दारुल उलूम के लिए एक राजनीतिक मुखपत्र बना। [154]

1941 में स्थापित जमात-ए-इस्लामी हिन्द (इस्लामी पार्टी) ने एक इस्लामी सरकार की स्थापना की वकालत की और समुदाय के लिए शिक्षा, समाज सेवा और एकतावादी पहुंच को बढ़ावा देने में सक्रिय रहा। [155]

1940 के दशक के बाद तब्लीघी जमात (आउटरीच सोसायटी) सक्रिय हो गई क्योंकि विशेष तौर पर उलेमा (धार्मिक नेताओं) के बीच एक आंदोलन शुरू हुई जिसमें व्यक्तिगत नवीनीकरण का तनाव, एक मिशनरी भावना और कट्टरपंथियों के लिए ध्यान जोर दिया गया। इस प्रकार की गतिविधियों की कड़ी आलोचना की गई जो कि सूफी धार्मिक स्थलों के आसपास शुरू हुई थी और उलेमा के प्रशिक्षण को मजबूर किए जाने के कारण यह सूक्ष्म बन कर रह गई। इसके विपरीत, अन्य उलेमा सामूहिक धर्म की वैधता को बरकरार रखा जिसमें पीर के उल्लास और पैगंबर की स्मृति शामिल है। सैयद अहमद खान के नेतृत्व में एक व्यापक, अधिक आधुनिक और अन्य प्रमुख मुस्लिम विश्वविद्यालयों के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (1875 तक मुहम्मदन ओरिएंटल कॉलेज के रूप में) में एक शक्तिशाली धर्मनिरपेक्षता को चलाया गया।.

हालांकि प्राचीन शहरों में दीवार से घिरे हुए शहर मुसलमानों का पारंपरिक आवास थे, विभाजन के बाद उच्च वर्ग के कई मुसलमान शहर के अन्य भागों में रहने लगे। भारतीय मुसलमानों के बीच बस्तीकरण 1970 के दशक के मध्य में शुरू हुआ जब प्रथम सांप्रदायिक दंगे हुए, 1989 के भागलपुर दंगों के बाद इसमें और बढ़ोतरी हुई और 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद यह एक प्रवृत्ति बन गई, उसके बाद शीघ्र ही कई प्रमुख शहरों में मुस्लिम बस्ती या एक अलग क्षेत्रों का विकास हुआ जहां मुस्लिम आबादी रहने लगी। [156] हालांकि इस प्रवृत्ति से प्रत्याशित सुरक्षा में कोई मदद नहीं मिली जो कि मुस्लिम बस्ती के गुमनामी को प्रदान करने का सोचा गया था, जैसा कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान देखा गया था, जहां कई मुस्लिम बस्तियों को आसानी से निशाना बनाया गया था, क्योंकि आवासीय कॉलोनियों की रूपरेखा में केवल सहायता मिली थी।[157][158][159][160]

बस्तियों में रहने के कारण सामाजिक रूढ़िबद्धता में विकास हुआ जिसका कारण था पार-सांस्कृतिक संपर्क का अभाव और बड़े पैमाने पर आर्थिक और शैक्षिक अवसरों में कमी. वहीं दूसरी तरफ, वह बड़ा समुदाय, जो इस्लामी परंपराओं के साथ सदियों से अपने संपर्कों के कारण लाभान्वित होता रहा और जिसने दो भिन्न परंपराओं के मिलन के माध्यम से निर्मित एक समृद्ध, सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने का विकास किया था, उस पर ्लग-थलग हो जाने का खतरा तेजी से मंडराने लगा। [161] कुछ लोगों के द्वारा भारत में धर्मनिरपेक्षता को लोकतंत्र के लिए अनिवार्य रूप के बजाए एक अल्पसंख्यक के रूप में देखा जा रहा है।[162][163]

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Hosted By:
Abhi Kathuria: https://twitter.com/abhi17kathuria
Video Edited By:
Ishan Savla
Sources
https://www.bestwebsiteinindia.com/blog/23popularindiandishesrecipesthatareworldfamous/
https://www.thespruceeats.com/mostpopularindianvegetariandishes1958017
https://www.quora.com/Whicharethetop10mostfamousIndianFood]

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